Friday, May 23, 2014

शिव हो जायेंगे शव

शिव हो जायेंगे शव
गर तोड़ दिया मौन
गले में रखना है गरल
निगलना-उगलना है निषेध....

यूँ जीवन है अनमोल
अकिंचन हैं इसकी तहें
पीपल पात-सा मन
डोलता है लगातार...

जैसे पर-पीर समझना है दुश्वार
मन-कंदरा भी है अबूझ
ढुलता है श्वेद और रक्त
हिरसता है अंतरतम....

घनी छाँव है आकाश-कुसुम
दो हाथ का फासला
तय नहीं होता ताज़िन्दगी
आँख के पथराने तक...


3 comments:

Digamber Naswa said...

गहरा भाव निहित है इन पंक्तियों में ...
बधाई इस रचना की ...

Anonymous said...

I have read so many articles or reviews regarding the blogger lovers except
this post is actually a fastidious article, keep it up.

my site ...Belinda Broido

Anonymous said...

Yes! Finally someone writes about new york mets.


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