Friday, July 18, 2008

दिसंबर १९८४ का कोई एक दिन

आत्मा अकेला आँसू बहाता उठता है
अपना कोई अपनापन जता के आओ
बहलाओ बाँहों से बहुत सारा बहुत बार
बेचारा बैचेन बेहाल होता बहुलता से
बेहद वीरानी में बौराया हुआ लगता
मजबूरी में फँसा हुआ बेचारा अकेला है।

1 comment:

www.thanalonline.com said...

I would like to read it. But my experience with Hindi ended with my SSLC. It was in 1961. If you are pleased to give a translation in English I could enjoy your writng. Will you please do it for me?