Tuesday, March 30, 2010

अरे! ओ अजनबी

वो है यारों का यार
शायद ही करे कोई इनकार

उसके बारे में हरेक के पास हैं - दसियों वाकये
कि वह बोलता है कम
और सुनता है ज्यादा
करो तारीफ तो - बदल देता है बात

चार यार सहमत हों
ऐसा कम होता है
पर उसका जिकर आते ही
सब होते हैं एक सुर

वो - बगैर बोले कहता है
बिना सुने समझता है
बहुतेरे हैं उसकी
इसी अदा के मुरीद

आहिस्ता से उठती है उसकी बात
और मुलामियत से पाती है विस्तार
उसकी खिलंदड़ मंडली में शामिल हैं
विचारवान और उन्मुक्त आस्थावान

उसके संगी साधक हैं
विरल और अलबेले
मानो दुनियावी विविधता के
बेफ्रिक नुमाइंदे

वे करते हैं सवाल - तो लगता है
जबाव दे रहे हैं - और
जबावों से पैदा होते हैं
फिर-फिर नये सवाल
कदाचित इस तरह वे खोजते हैं
मौज के बहाने

यूँ वहाँ अनेकों हैं पदवीधारी
पर नामों और सम्बोधनों का रुतबा
नहीं चलता वहाँ
पद और प्रतिष्ठा के चोचले
'एकांत' की झाड़ियों में
टंगे दिखते हैं अनुशासनबध्द

रतजगे की खुमारी में
डूबते-उतराते चेहरे
जब होते हैं नमूदार
और हल्की-सी जुम्बिश
कि शुरुआती कदमताल
पकड़ती है जब धारदार लय
जीवन-आनंद बिखरता है चारों ओर

पूछा उससे किसी ने
सही क्या है - गलत क्या है
कहा उसने :
जो चाहो करो
सब ठीक है तब तक
जब तक यह न भूलो
तुम्हारी पहली और आखिरी
प्रतिबध्दता अपनी प्रतिभा से है

तुम किसी के बेटे नहीं
किसी के बाप नहीं
किसी के पति नहीं
किसी के प्रेमी नहीं

तुम केवल तुम हो
और उतने भर हो
जितना तुम अपने
'तुम होने' के नाते करते हो
बाकी दुनियावी कचरा है

कभी किसी रोज़
कहा था उसने
जीवन का मकसद है
मौज करना
ऐसी अनेकों धारणाएँ
वह सहज ही करता है उजागर

अच्छा करने की पहली सीढ़ी है
अच्छा सोचना
और वह अपनी
दुधारी तलवार
इस्तेमाल ही नहीं करता
'हितकर' होना ही
उसकी है अहम व्याख्या

यूँ करने योग्य
गिनवाता है वह - पाँच काम
पहला-वर्जिश
दूसरा-जलपान
तीसरा-भोजन
चौथा-फिर व्यायाम
और अंत में फिर भोजन
कहता है वह
ये पाँच काम कर लिये
बाकी अपने आप हो जाएँगे

अति-विनयी हमारी परम्परा
बड़ाई को करती है खारिज
और फलदार पेड़ का झुकाव
महिमा पाता है
यही कारण है कि उसका
अनूठा स्वभाव
बखान नहीं पाता

उसके बरतावों की ऑंच
कायम रखती है दोस्ताना
आदतन की मिजाजपुर्सी
खिलाती है अनेकों रंग

वे होंगे कोई और
जो हो उठते हैं अधीर
उसके नक्शे-कदम
वजनदारी से उठते हैं

पाँत के नुमाइंदों के
सरोकार हो सकते हैं जुदा
पर उसकी पनाह में आके
होते हैं सभी एकसुर

चली बात इम्तहान की
तो वह था अव्वल
फिर चलना हो रस्सी पर
कि निभाना हो वादा

उसकी बातों में
नहीं है निराशा
नहीं है जीवन की असफलता
उसे कहीं नहीं जाना है
उसे कुछ नहीं पाना है
फिर क्यों चिंतित हुआ जाए
फिर क्यों कुछ कहा जाए

अक्सर ही वह
हो जाता है मौन
तब चेहरे पर उसके
उभरती है स्मित मुस्कान
कि जैसे ऍंधेरी रात में
चमक उठता है कोई तारा

शहर-दर-शहर
पायेंगे आप उसके मुरीद
उसकी सहजता है चुम्बकीय
जो दुनियावी दोगलेपन पर
पड़ती है भारी

उसकी आभा की गिरफ्त
छोड़ती है अमिट छाप
तब उसके ख्यालभर से
आप जिंदादिली गुनते हैं
उससे मिलने का विचार बुनते हैं

कभी किसी रोज़
उसके जेहन में भी
उठते हैं - स्याह और कमतर विचार
तब सोचता है वह
पानी की बरबादी की मानिंद
शब्दों का भी होता है दुरुपयोग

कहा था उसने कि वह
छिपकलियों से करता है बात
तिलचट्टे और बतखें
बतियाती हैं उससे घण्टों

सुबह-सुबह जब
फुनगी पर बैठी मैना
करती है उससे ऑंखें दो-चार
उसका बिंदासपना
अनेकों बार हो जाता है अबूझ

खुद उसे नहीं पता
क्यों कर वह
नृत्यरत पंखे में
खोजता है बचपना

सर्दियों की काली रातें
जब हो जाती हैं लम्बी और दुरूह
तब परछाईयों के घेरे
उसमें भरते हैं जोश
ठीक वैसे ही जैसे
जब लच्छेदार बातों
और खोखली तारीफों
को सुनते हुए वह
'हूँ-हूँ' की भरता है हुँकार

अक्सर ही
कदमताल की आवाजें
उसे याद दिलाती हैं
मिर्चों का तीखापन
और हुसैन सागर की खटास

सत्ता की गलियों में पसरा अजनबीपन
और कुंद करता यथा-स्थितिवाद
जब-तब उसे
भरा देता है छटपटाहट से
ऐसे में उसकी ऑंखें
खोजती हैं गीलापन
और लोहे की लकीरों पर
दक्षिण की ओर से आती हुई
ज़िंदगी

शब्दों से है उसे प्रेम
और अक्षरों की कतारों में
नज़र आता है छुटपना
रूठना और मनाना
खेलना और बतियाना
फिर-फिर लौटना अतीत में
जहाँ उसने पढ़े थे पाठ
कुछ सबसे उपयोग-दु-रुपयोग
किए शब्दों के

वह ठस होकर ठहरता नहीं
जकड़ता नहीं शब्दों से
उसके साथ
जकड़ना कहीं भी नहीं है
आप उसे जानते हैं 'ब्रदर'

तंद्रा में चलते लोग
और दुखियारे चेहरे
क्यों कर लगते हैं उसे
एक-से

सोचता है वह यूँ ही
हममें से हरेक
होना चाहता है क्यों-कर महान
सिर्फ और सिर्फ
शब्दों का करके इस्तेमाल

निर्विकार रहकर करूँ
दायित्व-निर्वहन
या कर गुजरूं इनके लिए
औकात से ज्यादा
सोचता है वह - और
भीतर से आती है आवाज़
तटस्थ रहकर भी
बहुत किया जा सकता है?

पैबन्द लगाऊँ कहाँ तक
यह चादर तो तार-तार है
अपने गिर्द उसे
अदृश्य सीमाएँ महसूसती हैं

दिलासा देते हुए हर बार
हौसला बढ़ता है उसका
जानते हैं नरम दिल लोग
दिलासा भी तो
राहत का है पहला पायदान

कभी जब वह
होता है उदास
उसे ख्याल आता है
डयूटी पर तैनात अर्दली
वो जो सुबहो-शाम
निभाता है हुकुम
घर में - किचिन में
कार में - दफ्तर में

यदा-कदा सोचता है वह
कहाँ तक निभा पाया
अपने दायित्व
कभी लगता है उसे
समंदर में बहती धार के बीच
वह बड़ी मछली के साथ भर है

उमंग से भरा वह चेहरा
बहुत कुछ था वहाँ देखने काबिल
थी वहाँ पच्चीस साला उपलब्धियाँ
लियाकत के तमाम नतीजे
और थी एक तड़प
जो औंचक ही उभर आती

यूँ तो हरेक इंसान एक कहानी है
थोड़े कम लोग उपन्यास होते हैं
लेकिन एक कविता में
समा जाती है पूरी दुनिया

कविता का स्पेस अनंत है
ऐसा ही अनकहा बहुतेरा
उसके चेहरे पर उभरता था
वहाँ एक कविता
शब्द खोजती थी

ऐसी कविता
कि जिसका आकार था अतुकांत
कि जिसकी लय थी पानीदार
ऑंख का आईना
कि जिसमें तस्वीर दिखे ज़िंदा

किस्सा यों बढ़ा कि बोला वह
आओ अजनबी - विराजो यहाँ
कि देखो मैंने दुनियावी वर्गभेद की
दीवारें ढहा दी हैं
औकात तौलने के तराजू
कब के टूट चुके हैं

सो आओ मित्रो
खोजें उस अजनबी को
जो बैठा है यहाँ मौन

कहता है सबसे
बैठो, मैं प्रस्तुत हूँ!

3 comments:

संजय भास्कर said...

बढ़िया प्रस्तुति पर हार्दिक बधाई.
ढेर सारी शुभकामनायें.

संजय कुमार
हरियाणा
http://sanjaybhaskar.blogspot.com

संजय भास्कर said...

बहुत सुंदर और उत्तम भाव लिए हुए.... खूबसूरत रचना......

संजय कुमार
हरियाणा
http://sanjaybhaskar.blogspot.com

Udan Tashtari said...

बहुत उम्दा!