Tuesday, March 3, 2009
शव और शिव
अवमानना (अपमान) वह ताप है जो आपके भीतर छुपे विकारों को उकसाता है -- वे खौलने लगते हैं और परीक्षा की घड़ी तो तब आती है जब वे बाहर बगरने को आतुर हो जाते हैं. मज़ा यह कि अधिकतम लोग इस खौलते लावे को बाहर उगल देते हैं और सारी ऊर्जा व्यर्थ बह जाती है. कुछ गिने-चुने समर्थ लोग इस खौल को कण्ठ में धारण कर लेते हैं -- ना निगलते हैं, ना उगलते हैं और तत्काल क्रांति घटती है शव होने की परिणति शिव होने की ओर चल पड़ती है.
Sunday, January 18, 2009
एकालाप
अभी तक ज़िंदा है
शरीर के भीतर
एक और शरीर
जो रोकता है
टोकता है
कटु-वचन बोलकर
भर उठता है
ग्लानि से
अपकर्म करके
करता है
पश्चाताप
पर-दुख-कातरता
अभी भी
बची है शेष
मेरे-तेरे भेद को
नहीं मानता
यह ठीक है कि
उसका जीवन
बहुत कम शेष है
लेकिन, निराश मत होओ मन
क्योंकि
मृत्यु-शैय्या पर
पड़ा रोगी
अभी मरा नहीं है
और आशा की डोर
अभी टूटी नहीं है
शरीर के भीतर
एक और शरीर
जो रोकता है
टोकता है
कटु-वचन बोलकर
भर उठता है
ग्लानि से
अपकर्म करके
करता है
पश्चाताप
पर-दुख-कातरता
अभी भी
बची है शेष
मेरे-तेरे भेद को
नहीं मानता
यह ठीक है कि
उसका जीवन
बहुत कम शेष है
लेकिन, निराश मत होओ मन
क्योंकि
मृत्यु-शैय्या पर
पड़ा रोगी
अभी मरा नहीं है
और आशा की डोर
अभी टूटी नहीं है
Monday, November 24, 2008
प्रिया! घर आने वाली हैं...
मन से उठी पुकार
प्रिया! घर आने वाली हैं...
घर की थानेदार
प्रिया! घर आने वाली हैं...
कागद-पत्तर करो व्यवस्थित
तकिया चारपाई और बिस्तर
तेल का पीपा धरो यथावत
होओ होशियार
प्रिया! घर आने वाली हैं...
विदा करो ठलुओं को घर से
बरतन-भांडे माँजो फिर से
करो सफाई घर की ऐसी
फैल जाए चमकार
प्रिया! घर आने वाली हैं...
हाथ चूम लेंगी वे आकर
लाड़ जताएँगी मुस्काकर
मन के झाँझ-मजीरे बोलें
खनकेगी खरतार
प्रिया! घर आने वाली हैं...
कानी कौंड़ी साथ न जाना
माया खातिर मन ललचाना
मौत सौतियाडाह करेगी
कर देगी बंटाढार
प्रिया! घर आने वाली हैं...
प्रिया! घर आने वाली हैं...
घर की थानेदार
प्रिया! घर आने वाली हैं...
कागद-पत्तर करो व्यवस्थित
तकिया चारपाई और बिस्तर
तेल का पीपा धरो यथावत
होओ होशियार
प्रिया! घर आने वाली हैं...
विदा करो ठलुओं को घर से
बरतन-भांडे माँजो फिर से
करो सफाई घर की ऐसी
फैल जाए चमकार
प्रिया! घर आने वाली हैं...
हाथ चूम लेंगी वे आकर
लाड़ जताएँगी मुस्काकर
मन के झाँझ-मजीरे बोलें
खनकेगी खरतार
प्रिया! घर आने वाली हैं...
कानी कौंड़ी साथ न जाना
माया खातिर मन ललचाना
मौत सौतियाडाह करेगी
कर देगी बंटाढार
प्रिया! घर आने वाली हैं...
Wednesday, November 12, 2008
प्रिया! घर आयेंगी...
किये साज-श्रृंगार
प्रिया! घर आयेंगी
मन के खोले द्वार
प्रिया! घर आयेंगी
हृदय-तंतु झनझना उठेंगे
शहनाई की तान सुनेंगे
रोम-रोम पुलकित होगा
खनकेगा तन का तार
प्रिया! घर आयेंगी...
मन मयूर नाचेगा उस क्षण
देहरी लाँघ आओगी जिस क्षण
भर आयेगा कंठ
पुलक जाओगी बारम्बार
प्रिया! घर आयेंगी...
नई-नकोर पायलिया पहने
रुनक-झुनक चलने में खनके
तुम्हें देखकर नयी पड़ोसन
फेंकेगी चुमकार
प्रिया! घर आयेंगी...
सखी-सहेली की कनबतियाँ
याद आयेंगी मन की बतियाँ
उभर आयेगी -
अम्मा-बाबा की फिर-फिर पुचकार
प्रिया! घर आयेंगी...
देस पराये सबको जाना
आपस्वार्थी मन बौराना
मेरा-मेरा चीखे हरदम
कर न पाए उपकार
प्रिया! घर आयेंगी...
प्रिया! घर आयेंगी
मन के खोले द्वार
प्रिया! घर आयेंगी
हृदय-तंतु झनझना उठेंगे
शहनाई की तान सुनेंगे
रोम-रोम पुलकित होगा
खनकेगा तन का तार
प्रिया! घर आयेंगी...
मन मयूर नाचेगा उस क्षण
देहरी लाँघ आओगी जिस क्षण
भर आयेगा कंठ
पुलक जाओगी बारम्बार
प्रिया! घर आयेंगी...
नई-नकोर पायलिया पहने
रुनक-झुनक चलने में खनके
तुम्हें देखकर नयी पड़ोसन
फेंकेगी चुमकार
प्रिया! घर आयेंगी...
सखी-सहेली की कनबतियाँ
याद आयेंगी मन की बतियाँ
उभर आयेगी -
अम्मा-बाबा की फिर-फिर पुचकार
प्रिया! घर आयेंगी...
देस पराये सबको जाना
आपस्वार्थी मन बौराना
मेरा-मेरा चीखे हरदम
कर न पाए उपकार
प्रिया! घर आयेंगी...
Thursday, November 6, 2008
प्रिया तुम पास नहीं हो
फूल आई कचनार
प्रिया तुम पास नहीं हो
रातें हुईं पहार
प्रिय तुम पास नहीं हो
सूख गई मन की चिकनाई
गुजरी रात भोर हो आई
बिसर गई मनुहार
प्रिया तुम पास नहीं हो
लगते घर के कमरे खाली
ज्यों शरबत की चटकी प्याली
सूना सब संसार
प्रिया तुम पास नहीं हो
मेरा हाल हुआ है ऐसे
बिना नमक की दाल हो जैसे
घर में नहीं अचार
प्रिया तुम पास नहीं हो
मुँह उठाए फिरता हूँ ऐसे
बिना धनी की भैंस हो जैसे
पूंछ उठाए - खूंटा तोड़े भरती है हुंकार
प्रिया तुम पास नहीं हो
खा-पीकर फिर मौज मनाई
निंदा-रस की चाट उड़ाई
अपनी खातिर माथा कूटा
पर-स्वारथ को मैल न छूटा
ज़िंदगानी दिन-रात खरचकर
महिने की हुई पगार
प्रिया तुम पास नहीं हो
प्रिया तुम पास नहीं हो
रातें हुईं पहार
प्रिय तुम पास नहीं हो
सूख गई मन की चिकनाई
गुजरी रात भोर हो आई
बिसर गई मनुहार
प्रिया तुम पास नहीं हो
लगते घर के कमरे खाली
ज्यों शरबत की चटकी प्याली
सूना सब संसार
प्रिया तुम पास नहीं हो
मेरा हाल हुआ है ऐसे
बिना नमक की दाल हो जैसे
घर में नहीं अचार
प्रिया तुम पास नहीं हो
मुँह उठाए फिरता हूँ ऐसे
बिना धनी की भैंस हो जैसे
पूंछ उठाए - खूंटा तोड़े भरती है हुंकार
प्रिया तुम पास नहीं हो
खा-पीकर फिर मौज मनाई
निंदा-रस की चाट उड़ाई
अपनी खातिर माथा कूटा
पर-स्वारथ को मैल न छूटा
ज़िंदगानी दिन-रात खरचकर
महिने की हुई पगार
प्रिया तुम पास नहीं हो
Friday, September 26, 2008
अमीवा
सजता है उनका दरबार और उसमें होने को शामिल तरसते हैं सब. जैसे तरबूजे को देखकर तरबूजा बदलता है रंग, वैसे ही उनकी नज़रें-इनायतों की खातिर सभी लगे हैं अपना काया-कल्प करने में. वे कहते हैं हाँ तो सामूहिक स्वर हामी भरता है. उनकी ना को सभी अनुनासिक होकर स्वीकारते हैं. तिस पर मज़ा यह कि वे अपनी इस भेड़ियाधसान फौज को अच्छी तरह पहचानते हैं.
कभी जब होते हैं वे नाखुश तो कुछ के चेहरे गमगीन और कुछ भीतर से आनंदित होते हैं. होती है किसी की तारीफ तो सभी डेढ़ इंच की मुस्कान लिये इसे प्रत्यक्ष-परोक्ष में अपनी हौसला अफजाई मानते हैं. दंत निपोरी की सभी धारायें प्राय: सभी को कंठस्थ हैं. पेंच की बातें वे अवसर जानकर और चासनी में लपेटकर प्रस्तुत करते हैं. मुँहदेखी पंचायत और ठकुर-सुहाती की परम्परा वहाँ अब बचपने से निकलकर यौवनावस्था को प्राप्त हो रही है.
वे कुछ बाँच रहे हैं, सभी उनके मुख को जाँच रहे हैं. उनके मुख से शब्द निकले नहीं कि बाकी उसे झेल लेते हैं. 'जी सर', 'ठीक है', 'अच्छी बात है', 'बेहतर है', 'हो जायेगा', 'देख लूँगा', 'मैं करता हूँ', 'करवाता हूँ' जैसे वाक्य वहाँ की दीवारों पर लिखे हुए हैं, जिन्हें सिर्फ बाकी के पढ़ पाते हैं. दरबारी पढ़ इसलिए पाते हैं, क्योंकि वे इन्हें सुनना चाहते हैं. 'ना न निकले' की ध्वनि वहाँ की हवा की शीतलता में घुलकर एकामेक हो गयी है और बाकियों पर उसका नींमअसर बराबर बना रहता है. 'हें-हें' का पहला दौर उपदेशात्मक होता है और बाकी वात्सल्यभाव से 'हें-हें' करते हैं. इस दौर का अंत चाय रूपी चरणामृत बंटन से होता है. जिन्हें चरणामृत मिला वे तृप्त और जिन्हें नहीं मिला वेर् ईष्या से लहालोट होते हैं.
वे जब मज़े के मूड़ में होते हैं तो मर्जी को उजागर नहीं करते. बाकी के तब उनकी छाप-तिलक टटोलने लगते हैं. उनकी मर्जी अन्धों का हाथी हो जाया करती है और वे मज़े-से उसकी सवारी गाँठते हैं. उनके कक्ष की फिजा समतामूलक है और समानता का छल-छन्द वहाँ अपने आप महसूसने लगता है. उनके मुख से निकले वाक्य वहाँ का संविधान हो जाता है.
चायरूपी चरणामृत पीकर जब मैं वहाँ से निकला लगा अमीवा में बदल गया हूँ.
कभी जब होते हैं वे नाखुश तो कुछ के चेहरे गमगीन और कुछ भीतर से आनंदित होते हैं. होती है किसी की तारीफ तो सभी डेढ़ इंच की मुस्कान लिये इसे प्रत्यक्ष-परोक्ष में अपनी हौसला अफजाई मानते हैं. दंत निपोरी की सभी धारायें प्राय: सभी को कंठस्थ हैं. पेंच की बातें वे अवसर जानकर और चासनी में लपेटकर प्रस्तुत करते हैं. मुँहदेखी पंचायत और ठकुर-सुहाती की परम्परा वहाँ अब बचपने से निकलकर यौवनावस्था को प्राप्त हो रही है.
वे कुछ बाँच रहे हैं, सभी उनके मुख को जाँच रहे हैं. उनके मुख से शब्द निकले नहीं कि बाकी उसे झेल लेते हैं. 'जी सर', 'ठीक है', 'अच्छी बात है', 'बेहतर है', 'हो जायेगा', 'देख लूँगा', 'मैं करता हूँ', 'करवाता हूँ' जैसे वाक्य वहाँ की दीवारों पर लिखे हुए हैं, जिन्हें सिर्फ बाकी के पढ़ पाते हैं. दरबारी पढ़ इसलिए पाते हैं, क्योंकि वे इन्हें सुनना चाहते हैं. 'ना न निकले' की ध्वनि वहाँ की हवा की शीतलता में घुलकर एकामेक हो गयी है और बाकियों पर उसका नींमअसर बराबर बना रहता है. 'हें-हें' का पहला दौर उपदेशात्मक होता है और बाकी वात्सल्यभाव से 'हें-हें' करते हैं. इस दौर का अंत चाय रूपी चरणामृत बंटन से होता है. जिन्हें चरणामृत मिला वे तृप्त और जिन्हें नहीं मिला वेर् ईष्या से लहालोट होते हैं.
वे जब मज़े के मूड़ में होते हैं तो मर्जी को उजागर नहीं करते. बाकी के तब उनकी छाप-तिलक टटोलने लगते हैं. उनकी मर्जी अन्धों का हाथी हो जाया करती है और वे मज़े-से उसकी सवारी गाँठते हैं. उनके कक्ष की फिजा समतामूलक है और समानता का छल-छन्द वहाँ अपने आप महसूसने लगता है. उनके मुख से निकले वाक्य वहाँ का संविधान हो जाता है.
चायरूपी चरणामृत पीकर जब मैं वहाँ से निकला लगा अमीवा में बदल गया हूँ.
रुटीन
हरेक अपने रुटीन का आदी होता है. यह बदलते ही छटपटाहट होती है. एक रुटीन के छूटते ही दूसरे को जमाने का प्रयास शुरू हो जाता है. लगातार एक जैसे काम नीरसता पैदा करते हैं और जोश में उन्हें बदलने की झोंक उठती है.
एक बार जंगल में जानवरों की सभा हुई. सभी ने तय किया कि स्वतंत्रता हमारा जन्मसिध्द अधिकार है सो हमारे भाईबंद जो आदमियों द्वारा बंधक बनाये या पाले गए हैं, उन्हें छुड़ाना चाहिए. क्राँति के सूत्रपात के तहत एक-एक करके सभी पालतू जानवरों को छुड़ाने का उपक्रम आरंभ हुआ. अंत में तेली के यहाँ कोल्हू के बैल के पास पहुँचे और उसे स्वतंत्रता के गीत सुनाये गए. कहा गया कि स्वतंत्रता हर जीव का जन्मसिध्द अधिकार है. बैल औंचक देखता रहा और बोला- इससे क्या फायदा होगा? सब बोले- तुम आजाद हो जाओगे. अपनी मर्जी से घूम फिर सकोगे और अपनी मर्जी से खा-पी सकोगे. बैल को बात कुछ समझ नहीं आई, लेकिन सभी का आग्रह था सो वह भी स्वतंत्र होकर जंगल में पहुँच गया. यहाँ उसके साथ सब कुछ नया और रोमांचक था. चारों ओर हरी-भरी घास थी. पीने को झरनों का स्वच्छ पानी था. आराम करने को पेड़ों की छाँव थी. खाओ-पिओ और आराम करो. उसने भरपेट खाया और आराम करते खाए हुए को पगुराया. एक झपकी भी ली.
और इस तरह कई दिन गुजर गए. खा लिए, पी लिए और मौज उड़ा ली, लेकिन जल्दी ही लीक पर चलने का सनातन अभ्यास जोर मारने लगा और बिना काम के वह बोर होने लगा. अब क्या करूँ नामक सवाल उसके दिमाग में बार-बार खड़ा हो रहा था. जंगल में बैल को करने लायक कुछ था भी नहीं. ज्यों-ज्यों वह दिमाग पर जोर डाले उसकी बेचैनी बढ़ने लगती. वह सोचने लगा और निष्कर्ष निकाला कि स्वतंत्रता का क्या यही मतलब है. अगर यह ऐसी ही है तो यह बड़ी कठिन है. खा-पीकर आराम करो और करने को कुछ नहीं. कितने दिनों तक यह सब चलता रहेगा. बैल से यह नयी स्वतंत्रता हजम नहीं हुई और वह बेचैनी में पड़ गया और अंतत: एक दिन सुबह तेली के दरवाजे पर खड़ा हो गया.
तेली ने बैल को देखा तो बोला- क्यों भई, क्या हुआ तुम्हारी स्वतंत्रता का. बैल मुँह लटकाए रहा और कोल्हू के पास जाकर खड़ा हो गया. तेली ने उसे फिर छेड़ा- बोलो भाई अपनी स्वतंत्रता के बारे में. बैल मरी आवाज में बोला- खाया-पिया और आराम किया. पर वहाँ करने को कुछ था नहीं सो ऐसी स्वतंत्रता किस काम की. मुझे बड़ी बेचैनी हो रही थी. लगा इससे अच्छा तो अपना पुराना काम ही था. खाने-पीने को कम मिलता था. डाँट अलग पड़ती थी, लेकिन रोजनदारी का काम तय था. दिमाग पर कोई जोर नहीं डालना पड़ता था. वहाँ तो दिमाग पर भारी जोर डाला पर करने लायक कुछ सूझा ही नहीं सो वापस आ गया.
एक बार जंगल में जानवरों की सभा हुई. सभी ने तय किया कि स्वतंत्रता हमारा जन्मसिध्द अधिकार है सो हमारे भाईबंद जो आदमियों द्वारा बंधक बनाये या पाले गए हैं, उन्हें छुड़ाना चाहिए. क्राँति के सूत्रपात के तहत एक-एक करके सभी पालतू जानवरों को छुड़ाने का उपक्रम आरंभ हुआ. अंत में तेली के यहाँ कोल्हू के बैल के पास पहुँचे और उसे स्वतंत्रता के गीत सुनाये गए. कहा गया कि स्वतंत्रता हर जीव का जन्मसिध्द अधिकार है. बैल औंचक देखता रहा और बोला- इससे क्या फायदा होगा? सब बोले- तुम आजाद हो जाओगे. अपनी मर्जी से घूम फिर सकोगे और अपनी मर्जी से खा-पी सकोगे. बैल को बात कुछ समझ नहीं आई, लेकिन सभी का आग्रह था सो वह भी स्वतंत्र होकर जंगल में पहुँच गया. यहाँ उसके साथ सब कुछ नया और रोमांचक था. चारों ओर हरी-भरी घास थी. पीने को झरनों का स्वच्छ पानी था. आराम करने को पेड़ों की छाँव थी. खाओ-पिओ और आराम करो. उसने भरपेट खाया और आराम करते खाए हुए को पगुराया. एक झपकी भी ली.
और इस तरह कई दिन गुजर गए. खा लिए, पी लिए और मौज उड़ा ली, लेकिन जल्दी ही लीक पर चलने का सनातन अभ्यास जोर मारने लगा और बिना काम के वह बोर होने लगा. अब क्या करूँ नामक सवाल उसके दिमाग में बार-बार खड़ा हो रहा था. जंगल में बैल को करने लायक कुछ था भी नहीं. ज्यों-ज्यों वह दिमाग पर जोर डाले उसकी बेचैनी बढ़ने लगती. वह सोचने लगा और निष्कर्ष निकाला कि स्वतंत्रता का क्या यही मतलब है. अगर यह ऐसी ही है तो यह बड़ी कठिन है. खा-पीकर आराम करो और करने को कुछ नहीं. कितने दिनों तक यह सब चलता रहेगा. बैल से यह नयी स्वतंत्रता हजम नहीं हुई और वह बेचैनी में पड़ गया और अंतत: एक दिन सुबह तेली के दरवाजे पर खड़ा हो गया.
तेली ने बैल को देखा तो बोला- क्यों भई, क्या हुआ तुम्हारी स्वतंत्रता का. बैल मुँह लटकाए रहा और कोल्हू के पास जाकर खड़ा हो गया. तेली ने उसे फिर छेड़ा- बोलो भाई अपनी स्वतंत्रता के बारे में. बैल मरी आवाज में बोला- खाया-पिया और आराम किया. पर वहाँ करने को कुछ था नहीं सो ऐसी स्वतंत्रता किस काम की. मुझे बड़ी बेचैनी हो रही थी. लगा इससे अच्छा तो अपना पुराना काम ही था. खाने-पीने को कम मिलता था. डाँट अलग पड़ती थी, लेकिन रोजनदारी का काम तय था. दिमाग पर कोई जोर नहीं डालना पड़ता था. वहाँ तो दिमाग पर भारी जोर डाला पर करने लायक कुछ सूझा ही नहीं सो वापस आ गया.
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