Tuesday, March 30, 2010

अरे! ओ अजनबी

वो है यारों का यार
शायद ही करे कोई इनकार

उसके बारे में हरेक के पास हैं - दसियों वाकये
कि वह बोलता है कम
और सुनता है ज्यादा
करो तारीफ तो - बदल देता है बात

चार यार सहमत हों
ऐसा कम होता है
पर उसका जिकर आते ही
सब होते हैं एक सुर

वो - बगैर बोले कहता है
बिना सुने समझता है
बहुतेरे हैं उसकी
इसी अदा के मुरीद

आहिस्ता से उठती है उसकी बात
और मुलामियत से पाती है विस्तार
उसकी खिलंदड़ मंडली में शामिल हैं
विचारवान और उन्मुक्त आस्थावान

उसके संगी साधक हैं
विरल और अलबेले
मानो दुनियावी विविधता के
बेफ्रिक नुमाइंदे

वे करते हैं सवाल - तो लगता है
जबाव दे रहे हैं - और
जबावों से पैदा होते हैं
फिर-फिर नये सवाल
कदाचित इस तरह वे खोजते हैं
मौज के बहाने

यूँ वहाँ अनेकों हैं पदवीधारी
पर नामों और सम्बोधनों का रुतबा
नहीं चलता वहाँ
पद और प्रतिष्ठा के चोचले
'एकांत' की झाड़ियों में
टंगे दिखते हैं अनुशासनबध्द

रतजगे की खुमारी में
डूबते-उतराते चेहरे
जब होते हैं नमूदार
और हल्की-सी जुम्बिश
कि शुरुआती कदमताल
पकड़ती है जब धारदार लय
जीवन-आनंद बिखरता है चारों ओर

पूछा उससे किसी ने
सही क्या है - गलत क्या है
कहा उसने :
जो चाहो करो
सब ठीक है तब तक
जब तक यह न भूलो
तुम्हारी पहली और आखिरी
प्रतिबध्दता अपनी प्रतिभा से है

तुम किसी के बेटे नहीं
किसी के बाप नहीं
किसी के पति नहीं
किसी के प्रेमी नहीं

तुम केवल तुम हो
और उतने भर हो
जितना तुम अपने
'तुम होने' के नाते करते हो
बाकी दुनियावी कचरा है

कभी किसी रोज़
कहा था उसने
जीवन का मकसद है
मौज करना
ऐसी अनेकों धारणाएँ
वह सहज ही करता है उजागर

अच्छा करने की पहली सीढ़ी है
अच्छा सोचना
और वह अपनी
दुधारी तलवार
इस्तेमाल ही नहीं करता
'हितकर' होना ही
उसकी है अहम व्याख्या

यूँ करने योग्य
गिनवाता है वह - पाँच काम
पहला-वर्जिश
दूसरा-जलपान
तीसरा-भोजन
चौथा-फिर व्यायाम
और अंत में फिर भोजन
कहता है वह
ये पाँच काम कर लिये
बाकी अपने आप हो जाएँगे

अति-विनयी हमारी परम्परा
बड़ाई को करती है खारिज
और फलदार पेड़ का झुकाव
महिमा पाता है
यही कारण है कि उसका
अनूठा स्वभाव
बखान नहीं पाता

उसके बरतावों की ऑंच
कायम रखती है दोस्ताना
आदतन की मिजाजपुर्सी
खिलाती है अनेकों रंग

वे होंगे कोई और
जो हो उठते हैं अधीर
उसके नक्शे-कदम
वजनदारी से उठते हैं

पाँत के नुमाइंदों के
सरोकार हो सकते हैं जुदा
पर उसकी पनाह में आके
होते हैं सभी एकसुर

चली बात इम्तहान की
तो वह था अव्वल
फिर चलना हो रस्सी पर
कि निभाना हो वादा

उसकी बातों में
नहीं है निराशा
नहीं है जीवन की असफलता
उसे कहीं नहीं जाना है
उसे कुछ नहीं पाना है
फिर क्यों चिंतित हुआ जाए
फिर क्यों कुछ कहा जाए

अक्सर ही वह
हो जाता है मौन
तब चेहरे पर उसके
उभरती है स्मित मुस्कान
कि जैसे ऍंधेरी रात में
चमक उठता है कोई तारा

शहर-दर-शहर
पायेंगे आप उसके मुरीद
उसकी सहजता है चुम्बकीय
जो दुनियावी दोगलेपन पर
पड़ती है भारी

उसकी आभा की गिरफ्त
छोड़ती है अमिट छाप
तब उसके ख्यालभर से
आप जिंदादिली गुनते हैं
उससे मिलने का विचार बुनते हैं

कभी किसी रोज़
उसके जेहन में भी
उठते हैं - स्याह और कमतर विचार
तब सोचता है वह
पानी की बरबादी की मानिंद
शब्दों का भी होता है दुरुपयोग

कहा था उसने कि वह
छिपकलियों से करता है बात
तिलचट्टे और बतखें
बतियाती हैं उससे घण्टों

सुबह-सुबह जब
फुनगी पर बैठी मैना
करती है उससे ऑंखें दो-चार
उसका बिंदासपना
अनेकों बार हो जाता है अबूझ

खुद उसे नहीं पता
क्यों कर वह
नृत्यरत पंखे में
खोजता है बचपना

सर्दियों की काली रातें
जब हो जाती हैं लम्बी और दुरूह
तब परछाईयों के घेरे
उसमें भरते हैं जोश
ठीक वैसे ही जैसे
जब लच्छेदार बातों
और खोखली तारीफों
को सुनते हुए वह
'हूँ-हूँ' की भरता है हुँकार

अक्सर ही
कदमताल की आवाजें
उसे याद दिलाती हैं
मिर्चों का तीखापन
और हुसैन सागर की खटास

सत्ता की गलियों में पसरा अजनबीपन
और कुंद करता यथा-स्थितिवाद
जब-तब उसे
भरा देता है छटपटाहट से
ऐसे में उसकी ऑंखें
खोजती हैं गीलापन
और लोहे की लकीरों पर
दक्षिण की ओर से आती हुई
ज़िंदगी

शब्दों से है उसे प्रेम
और अक्षरों की कतारों में
नज़र आता है छुटपना
रूठना और मनाना
खेलना और बतियाना
फिर-फिर लौटना अतीत में
जहाँ उसने पढ़े थे पाठ
कुछ सबसे उपयोग-दु-रुपयोग
किए शब्दों के

वह ठस होकर ठहरता नहीं
जकड़ता नहीं शब्दों से
उसके साथ
जकड़ना कहीं भी नहीं है
आप उसे जानते हैं 'ब्रदर'

तंद्रा में चलते लोग
और दुखियारे चेहरे
क्यों कर लगते हैं उसे
एक-से

सोचता है वह यूँ ही
हममें से हरेक
होना चाहता है क्यों-कर महान
सिर्फ और सिर्फ
शब्दों का करके इस्तेमाल

निर्विकार रहकर करूँ
दायित्व-निर्वहन
या कर गुजरूं इनके लिए
औकात से ज्यादा
सोचता है वह - और
भीतर से आती है आवाज़
तटस्थ रहकर भी
बहुत किया जा सकता है?

पैबन्द लगाऊँ कहाँ तक
यह चादर तो तार-तार है
अपने गिर्द उसे
अदृश्य सीमाएँ महसूसती हैं

दिलासा देते हुए हर बार
हौसला बढ़ता है उसका
जानते हैं नरम दिल लोग
दिलासा भी तो
राहत का है पहला पायदान

कभी जब वह
होता है उदास
उसे ख्याल आता है
डयूटी पर तैनात अर्दली
वो जो सुबहो-शाम
निभाता है हुकुम
घर में - किचिन में
कार में - दफ्तर में

यदा-कदा सोचता है वह
कहाँ तक निभा पाया
अपने दायित्व
कभी लगता है उसे
समंदर में बहती धार के बीच
वह बड़ी मछली के साथ भर है

उमंग से भरा वह चेहरा
बहुत कुछ था वहाँ देखने काबिल
थी वहाँ पच्चीस साला उपलब्धियाँ
लियाकत के तमाम नतीजे
और थी एक तड़प
जो औंचक ही उभर आती

यूँ तो हरेक इंसान एक कहानी है
थोड़े कम लोग उपन्यास होते हैं
लेकिन एक कविता में
समा जाती है पूरी दुनिया

कविता का स्पेस अनंत है
ऐसा ही अनकहा बहुतेरा
उसके चेहरे पर उभरता था
वहाँ एक कविता
शब्द खोजती थी

ऐसी कविता
कि जिसका आकार था अतुकांत
कि जिसकी लय थी पानीदार
ऑंख का आईना
कि जिसमें तस्वीर दिखे ज़िंदा

किस्सा यों बढ़ा कि बोला वह
आओ अजनबी - विराजो यहाँ
कि देखो मैंने दुनियावी वर्गभेद की
दीवारें ढहा दी हैं
औकात तौलने के तराजू
कब के टूट चुके हैं

सो आओ मित्रो
खोजें उस अजनबी को
जो बैठा है यहाँ मौन

कहता है सबसे
बैठो, मैं प्रस्तुत हूँ!

Thursday, January 21, 2010

साहित्यिक सुख

देश में शादियों का मौसम चरम पर पहुँचकर गुजरा है. इस दौरान तरह-तरह की पातियों और कार्डों से बाजार भरे पड़े थे. इस सुखद मौके के बहाने लोगों ने अपनी कलात्मक और साहित्यिक अभिरुचि को जाँचा-परखा और अभिव्यक्त किया. एक ज़माना वह भी था जब हल्दी-चावल छींट कर नेह-निमंत्रण हाथ से लिखे जाते थे और आम लोगों को खबास और खास लोगों को खुद अपने हाथों सौंपने में फक्र महसूस किया जाता था.

अब नये ज़माने का चलन प्रदर्शनकारी है और इस मौके पर लोग लगे हाथों साहित्य-सृजन का सुख भी लूट लेना चाहते हैं. कार्डों के साहित्यिक पहलू की विवेचना ज्ञानी करेंगे, फिलहाल कार्डों पर छपी इबारत के कुछ नमूने पेश हैं :

- सुख समृध्दि का होगा अर्जन, जब होगा तेल श्रीगणेश पूजन.

- बड़ी अनूठी रीत है, प्यारी-सी सौगात, मंडप में होंगे खड़े ले मामाश्री भात.

- सात फेरे सात वचन होंगे जब स्वीकार, परिपूर्ण होगा तभी पाणिग्रहण संस्कार.

- जब जायेगी घर ऑंगन से बेटी की डोली, आप हम सबकी होंगी ऑंखें गीली.

- हल्दी है चन्दन है रिश्तों का बंधन है, हमारी दीदी की शादी में आप सभी का अभिनंदन है.

- हमें इंतज़ार है आपके आने का, स्मरणीय हैं ब्रह्मा, विष्णु, महेश, साथ होंगे आप और हम, साक्षी होंगे धरा, अम्बर, अरुण, वरुण एवं अग्नि, सुअवसर होगा परिणय सूत्र के अटूट बन्धन का.

- आपका शुभागमन एवं स्नेहभरा आशीर्वाद, नव-जीवन में प्रविष्ट होने वाले, इन पथिकों के लिए अमूल्य उपहार होगा, हम आपके आगमन के लिए आतुर रहेंगे.

- दुनिया का नियम है, हमने भी निभाया है, अपनी बिटिया को आज दुल्हन बनाया है.

- वर्षों से रखा था, जिस संभालकर, दे रहे हैं उसे हृदय से निकालकर.

- खुशी है, थोड़ा दर्द हो रहा है, बेटी होती है पराई, आज अहसास हो रहा है.

- परिणय सूत्र बंधन के आनंद उत्सव पर हम सत्कार की थाली में, चन्दन-सा आदर, कुमकुम-सी आस्था, पुष्प-सा प्रेम, अक्षत और समर्पण लिए आपके स्वागत हेतु प्रतीक्षारत हैं.

- सोचो मत आना है, रिश्तों को निभाना है, मेरे चाचा की शादी में महफिल को खुशियों से सजाना है.

- अनुरोध : कृपया समयाभाव के कारण निमंत्रण पत्र को ही व्यक्तिगत उपस्थिति मानकर पधारने की कृपा करें.

गाँव देहात की एक पुरानी कहावत है - एक थे राम एक रावणना, उननें उनकी नारि हरी, उनने उनको नाश करो, बात थी केवल इतनी सी और तुलसी लिख गए पोथन्ना.

यानी सरस तरीके से देशज समाज बड़ी और मूल्यवान बातें भी दो लाइन में समेट लेता है. लेकिन आज का तथाकथित मध्यवर्ग! उसकी थाह पाना बहुत मुश्किल है. उसका कोई भरोसा नहीं कि वह कब और कहाँ आधुनिक होकर पुरानी परम्पराओं को कूड़ा बताये या फिर उन्हें थाती से लगाये. वे शादी के कार्ड बनाते समय साहित्यिक हो जाते हैं और ऐसा मानते हैं कि जो कार्ड जितने भारी और कठिन शब्दों से भरा-पूरा होगा - उसकी उतनी ही धाक जमेगी. हालाँकि यह खुशफहमी भर होती है, क्योंकि सिवाय तारीखें देखने के शायद ही कार्ड को कोई गंभरता से पढ़ता होगा.

कड़वा सच यह भी है कि हिन्दी समाज में पढ़ने की आदत लगातार खत्म होती जा रही है. अखबार के पन्नों को पढ़ लेना ही बड़ी बात समझी जाने लगी है. गुजरे जमाने में कम से कम कथा-पोथी और सत्संग के बहाने शब्दों की ताकत और महिमा कायम थी, लेकिन अब न शब्दों में वह असर पैदा होता है और न वैसे सरोकार बचे हैं. बस एक तरह का अर्थहीन शब्दों का सिलसिला चल पड़ा है.

Saturday, December 19, 2009

नफरत के बीज

तीसरी कक्षा में पढ़ने वाली मेरी बेटी ने मुझे एक गाना सुनाया. मैंने सुना और हँस दिया. गाने पर आप भी गौर करें -


(सुनो गौर से दुनिया वालो, बुरी नज़र न हम पर डालो, चाहे जितना ज़ोर लगा लो) की तर्ज पर गाना था -

सुनो गौर से दुनिया वालो

फटे दूध की चाय बना लो

शक्कर-पत्ती कुछ न डालो

पीने वाले होंगे पाकिस्तानी

हमने बनायी है, तुम भी पियो...


इस गाने में - पाकिस्तानी - शब्द उसके दिमाग में कहाँ से आया? यह सवाल है. मैं जिस शहर में रहता हूँ वह पूरी दुनिया में गैस कांड के नाम से भी जाना जाता है और गैस कांड में हजारों मासूमों को जान गंवानी पड़ी. गैस त्रासदी के लिए जिम्मेदार देश के लिए मेरी बच्ची के दिमाग में कुछ भी नकारात्मक नहीं है? क्यों? जबकि पाकिस्तान हमारे साथ क्या-कुछ कर रहा है, वह अर्द्धसत्य ही ज्यादा है और जगजाहिर है कि राजनैतिक सच्ची तस्वीर उजागर होने के खिलाफ रहते है.

बच्चों के दिमाग में अनजाने ही बोए गए नफरत के इन बीजों की फसल कैसी होगी? सोच कर दिल काँप उठता है.

Friday, September 4, 2009

भरा-पूरा इंसान

उन्हें पढ़ते हुए अक्सर ही ईर्ष्यालु हो उठता हूँ कि देखो 94 साल के बुजुर्गवार किस कदर ज़िंदगी के मज़े उड़ा रहे हैं. रोज़ दो पेग शैम्पेन और बढ़िया स्कॉच पीते हैं. महिला-मित्रों और तमाम नामी लोगों के किस्से चटकारे लेकर लिखते हैं. दुनियाभर की खुशफ़हम बातें सुनाते हैं और खुद गुड़ खाकर दूसरों को गुलगुले खाने की सलाह देते हैं. हैं न कमाल के ज़िंदादिल इंसान.

बात कर रहा हूँ मशहूर हस्ती खुशवंत सिंह के बारे में, जिनके लिखे को मैं बेहद पसंद करता हूँ. उनके हफ्तावार छपने वाले कॉलम को हर हाल में पढ़ता हूँ. चुनाचे मैं उनका मुरीद हूँ और चंद प्रेरणास्पद लोगों की सूची में उन्हें अव्वल दर्जे पर रखता हूँ. अब सवाल है कि फिर क्योंकर उनसे ईर्ष्या होती है. तो वो ये कि किस कदर ज़िंदादिली भरी है इस इंसान में. दुनिया जहान के बोझों से मुक्त. ज़िंदगी को खालिस मज़ा उठाने की चीज़ मानते हुए उनका फलसफा एकदम साफ है. यह जीवन रोने-बिसूरने के लिए नहीं है - यह तो मौज़ करने के लिए है. इसका मतलब यह कतई नहीं है कि दुनिया को लेकर उनका रवैया गैर जिम्मेदाराना है. जब जरूरत पड़ती है वो दुनियावी मुद्दों पर बगैर लाग-लपेट के अपनी राय जाहिर करते हैं.

कुल जमा इतना भर कि उनके लिखे को बाँचकर खुशी मिलती है और ईर्ष्या इसलिए कि उनके जैसा साफ और बेबाक लिखने का हुनर कहाँ से पैदा होता है, नहीं जानता. हालाँकि वे मूल तौर पर अँगरेजी में लिखते हैं (पक्के तौर पर नहीं जानता) और हिन्दी में अनुवाद होकर छपता है. शायद इसीलिए खुशवंत सिंह को पढ़ते हुए वैसा घरोवा महसूस नहीं होता जैसा हिन्दी के नामी और दीगर लेखकों को पढ़कर होता है. उनके लिखे की दिलेरी की एक वजह शायद अँगरेजी में लिखे जाने की वजह से भी पैदा होती है. अँगरेजी हमें हिम्मती बनाती है - बहुत-सी बातों, परम्पराओं, धारणाओं से मुक्त करती है. यह बात केवल अँगरेजी के साथ ही नहीं दुनिया की तमाम दीगर भाषाओं पर लागू हो सकती है. यानी आप मातृभाषा से इतर किसी भी भाषा में लिखेंगे तो अतिरिक्त दिलेरी अपने आप आ जायेगी. हालाँकि नामी रचनाकारों ने मातृभाषा में भी अद्भुत लिखा और नये मिथ-मुहावरे गढ़े हैं.

हालाँकि अपने सुदीर्घ जीवन में खुशवंत सिंह ने भी कथनी और करनी के द्वैत का सामना किया होगा. बहुतेरे लोग उन्हें करीब से जानते होंगे, लेकिन मुझ जैसे उनके पाठक-प्रशंसक उनके बारे में उतना ही जानते हैं जितना उन्होंने अपने बारे में बताया या कि फिर उनकी किताबों, संस्मरणों या आत्मकथा से बयान हो सका. यहाँ जिक्र लाज़िमी है कि हिन्दी के पाठकों को खुशवंत सिंह के बहुआयामी व्यक्तित्व को जानने के लिए उनके नामी उपन्यास 'दिल्ली' का उषा महाजन द्वारा किया गया अनुवाद जो 1994 में प्रकाशित हुआ था, से खासी मदद मिलती है.

उनके कुछ निष्कर्ष जो मैं समझ सका :

फूल खिलता है तो वह किसी के पास नहीं जाता कि तुम मेरी सुंदरता को देखो, मेरी खुशबू महसूस करो. लोग स्वयं ही फूल की खासियतों की वजह से उसके पास पहुँचते हैं.

अपनी शक्ति पहचानो और ऊर्जावान बनो. लेकिन बनोगे कैसे? क्योंकि हमारी दृष्टि तो केवल दूसरों पर ही बनी रहती है.

अक्सर लोग अपने अंदर के खोखलेपन से भयभीत होकर दोहरेपन का पर्दा लगा लेते हैं. वे चाहते हैं कि हमारे खालीपन को कोई देख न सके और यहीं से शुरू होता है छिपाव का सिलसिला जो ज़िंदगी को नरक में तब्दील होने तक चलता रहता है.

लोग कहते हैं कि उन्होंने अपने समाज, अपने परिवार और अपने बेटों के लिए क्या नहीं किया, लेकिन सभी लोग समय गुजरने के साथ कृतघ्नी हो गए. दगाबाजी याद रखने की वजह से लोग दुखी होते रहते हैं, जबकि हमें लोगों के द्वारा दी गई मदद को याद करके खुश होते रहना चाहिए.

बहरहाल, एक भरे-पूरे इंसान की बातों से दर्जनों सूक्तियाँ निकाली जा सकती हैं.

Wednesday, August 12, 2009

कीमती संदर्भ

पिछले दिनों अथर्ववेद पर प्रख्यात विद्वान करपात्रीजी की टीका पढ़ रहा था। हालाँकि इस टीका में उन्होंने कहीं भी ऐसा दावा नहीं किया है कि अथर्ववेद की उनकी यह मौलिक व्याख्या है। टीका की भूमिका में - कवि न होऊँ, नहिं चतुर कहावउँ - वाली विनम्रता ही उजागर हो पाती है। खैर.

हरेक के भीतरर् कत्ता (करने वाला) और दृष्टा (देखने वाला या तटस्थ या वह जिसे गाँधीजी आत्मा की आवाज़ कहते हैं) का द्वंद्व लगातार चलता रहता है. कुछ तथ्य हैं जिन पर गौर करें :

जीवन में उच्च भौतिक उपलब्धियों को हासिल करने के बाद अचानक व्यर्थताबोध का भाव प्रबल हो उठता है, लगता है कि नाहक ही इसकी खातिर इतना श्रम, इतने संसाधन खर्च किये गये.

दूसरी ओर विकट बुरी दशा में, जब कोई वश नहीं चलता, अचानक से हम शांत हो जाते हैं - सारा विरोध और कुछ कर गुजरने की सारी बेचैनी गायब हो जाती है, कि जैसे हम परिस्थिति के हाथों खुद को छोड़ देते हैं. कुल निष्कर्ष यह कि भीतरी दुनिया में दो का द्वंद्व लगातार जारी है। कभी एक सक्रिय होकर दूसरे पर भारी पड़ता है तो कभी दूसरा पहले पर.

अथर्ववेद का ऋषि कहता है : मैं अमृतमयी वाणी बोलूं, मेरी जिह्वा के अग्रभाग में माधुर्य हो, जिह्वा के मूल में माधुर्य का स्त्रोत हो, मेरे कर्म, बुध्दि, विचार और चित मधुसिक्त हों. यह ऋषि द्वारा माधुर्य प्राप्ति के लिए ईश्वर से की गई प्रार्थना है. माधुर्य ही इस सृष्टि में आनंद लोक के निर्माण में उत्प्रेरक का कार्य कर सकता है. वास्तव में आनंद का उद्गम स्थल तो हमारा हृदय ही है, परंतु जीवन की मधुरता आनंद के इस उद्रेक को बढ़ाती है.

सुख से आगे की स्थिति है आनंद. सुख की सीमाएं हैं, परंतु आनंद किसी सीमा बंधन में नहीं बंधता. आनंद अपार होता है. प्रेम, सहानुभूति, दया, करुणा, सौहार्द और सहिष्णुता आनंद को बढ़ाने वाली प्रवृत्तियां हैं. इसी प्रकारर् ईष्या, द्वेष, घृणा और इनसे उत्पन्न होने वाली उत्तेजना, आवेश और क्रोध हमारे भीतर आनंद के कलश को खाली कर देते हैं.

करपात्री जी आनंद की व्याख्या करते हुए लिखते हैं :

वास्तव में आनंद, जीवन के प्रति हमारे दृष्टिकोण पर निर्भर करता है.र् ईष्या के दो स्वरूप माने गए हैं. यदिर् ईष्या स्वस्थ प्रतिद्वंद्विता को जन्म देती है और मानव के उत्थान में सहायक होती है, तो इसेर् ईष्या का सकारात्मक स्वरूप कहा जाएगा. परंतु यदिर् ईष्या दूसरे की उन्नति से हमारे भीतर द्वेष उत्पन्न करती है तो यहर् ईष्या का नकारात्मक स्वरूप कहलाएगा. ईष्या से ही द्वेष की भी उत्पत्ति होती है और द्वेष दूसरे को केवल हानि ही नहीं पहुंचाता बल्कि हमारे आनंद को भी दग्ध करता है. दूसरे को हानि पहुंचाने पर व्यक्ति स्वयं भी मलिनता से ग्रस्त रहता है, ठीक उसी प्रकार जैसे क्रिया की प्रतिक्रिया होना अवश्यंभावी है. दुर्भावनाएं,र् ईष्या और द्वेष की पूरक हैं और हमारे भीतर आवेश और क्रोध का संचार करती हैं. कहा गया है किर् ईष्यालु का अन्त:करण मृतप्राय हो जाता है. आवेश और उत्तेजना, व्यक्ति के अन्तस को अनुभूतियों से रिक्त कर देती हैं और वह व्यक्ति क्रोध और प्रतिशोध को ही जीवन का ध्येय बना लेता है.

Sunday, August 2, 2009

छवि और भय

कह डालने से क्यों डरते हो?
क्यों स्थगित करते हो
आज को कल पर
तब कि जब
माँजते थे रकाबियाँ
गंदे और सड़े होटल में
और देखते थे ख्वाब
कि जब होऊँगा कदवान
कह जाऊँगा सब कुछ...

अब कि जब
परछाईं भी बताती है
पाँच-फुटा तो हो ही
पर अब तुम्हें
कह जाने के लिए
ताड़-सा कद चाहिए...

नहीं-नहीं कद तो बहाना है
असल में तुम कायर हो
और अपनी छवि से भयभीत हो...

अपनी छवि जो बसी है
तुम्हारी अपनी ऑंखों में
कह जाने से वह दरकेगी
वह दरक भी सकती है
इस संभावना मात्र से
तुम काँप उठते हो...

उबरो अपनी छवि के मायावी घेरे से
कल कि जब निश्चित ही
होगा तुम्हारा तिया-पाँचा
क्यों नहीं अपने हाथों
चीर डालते अपना हृदय...

क्यों नहीं फोड़ते वह ठीकरा
जिसमें भरी हैं
सड़कर बजबजातीं
मिठास-भरी पूर्व-स्मृतियाँ...

कि जैसे हगना-मूतना स्वाभाविक है
ठीक वैसे ही
भीतर भरी काली इच्छाएँ
उत्सर्जित होनी चाहिए...

और फिर पूरी संभावना है
कि उस गटर-गंगा में
मिल जाए एकाध मोती
जो किसी के तो क्या
शायद तुम्हारे ही काम आ जाए...

चेतो कि अपनी गढ़ी छवियों से
डरने वाले लोग
निश्चय ही मारे जाएँगे
और जिएँगे वे अनंतकाल तक
जो अपनी छवि को फिर-फिर
तोड़ेंगे और लगातार तोड़ते रहेंगे...

Friday, June 26, 2009

अपराधबोध

जानकार ऐसा कहते हैं कि हमारा राष्ट्रीय चरित्र विक्टोरियन अपराधबोध से पीड़ित है - एक ऐसी मानसिकता जो हमारे आचार-व्यवहार में दिखाई देती है, जो हमें उन्मुक्तता के साथ प्रदर्शित होने में बाधा बनती है. हमारा खान-पान, जीवनशैली सभी इससे संचालित होते हैं. हमारे सम्पूर्ण चरित्र पर यह शैली हावी हो गयी है. एक 'गिल्ट' है जो सर्वत्र व्याप्त है. एक अघोषित आचरण हम सब पर छा गया है. दुनिया के बहुतेरे समाजों में जो उल्लास-उमंग और जिजीविषा दिखाई देती है वह हमारे यहाँ सिरे से गायब है. कोई भी अवसर हो 'गिल्ट' की यह वृत्ति तत्काल वहाँ उपस्थित हो जाती है.

मातु-पिता-गुरु-प्रभु की बानी, बिना विचारि करिय शुभ जानी.

हमारे यहाँ विचारवान बनने पर ज्यादा जोर नहीं है. हमें अनुसरण करने की सीख बचपने से दी जाती है. यही कारण है कि भक्तिभाव का ज्यादा जोर हमारे स्वभाव में यों घुल-मिल गया है कि जैसे दूध में पानी. यूँ लगता है कि हमारा पूरा समाज वीतरागी बन गया है - जैसे उदासी समाज है. यूँ तो हमारा समाज उत्सवप्रिय है. उत्सवधर्मिता हमारी जीवनशैली है, लेकिन अब ये दो विपरीत ध्रुव हैं. एक तरफ उत्सवप्रियता है दूसरी तरफ अधिसंख्य सामाजिक दायित्वों के प्रति उदासीनता का भाव. हमारे अधिकांश उत्सव समाज की सन्निकटता को उजागर करते हैं. पर यह सन्निकटता या मेल-मिलाप एक खास तरह की रस्मों को निभाने की तरह हो जाता है.

जीवन में बिना कीमत कुछ भी हासिल नहीं होता. बेकीमत सिर्फ शरीर मिला है और विचार भी बेकीमत उठते हैं. विचार जब आचरण में बदलते हैं तब वे मूल्यवान हो जाते हैं, लेकिन ये बड़ा श्रमसाध्य और पीड़ाजनक कार्य है. मन और शरीर को बड़ी तकलीफ होती है. विचारों का आवेग पानी जैसा है- सतत प्रवाहमान. उसे अगर रोका गया तो वह दाएँ-बाएँ फैलने लगता है. एक तरह से अवरोध को तोड़ने की ताकत इकट्ठी करना शुरू कर देता है. किसी भी विचार को अगर बाधित किया जाए तो मन को बेचैनी से भर देता है, अस्तु विचारों की स्वतंत्रता महत्वपूर्ण है.

जीवों में मनुष्य ही ऐसा है जिसने स्वतंत्रता के साथ परतंत्रता का स्वाद चखा है और बयान किया है वरना प्रकृति में सभी स्वतंत्र हैं, मनुष्य को छोड़कर. इसलिए हमारा अंतस बेचैन है. विकासक्रम में हम आगे इसलिए हैं क्योंकि हमने किसी हद तक प्रकृति के नियमों को तोड़ा है. यह तरक्की बंधन पैदा करती है. यह बंधन सुख के साथ दुख भी देता है. सुविधाएँ हमें आरामतलब बनाती हैं. वे हमें बाँधती हैं.

प्रकृति में जितने अवयव हैं वे सब स्वतंत्र हैं इसलिए स्वतंत्रता प्राकृतिक है. चिड़ियाँ उड़ने को स्वतंत्र हैं, पेड़ झूमने को स्वतंत्र हैं, लेकिन आदमी हँसने को स्वतंत्र नहीं है. हमने गरीब-अमीर शब्दों का आविष्कार किया है और खाई बनायी है. असमानता हमने पैदा की है. कहा जा सकता है कि वनमानुषों का समाज कई अर्थों में समरस था. लेकिन विकास का चक्र उल्टा नहीं घूमता. लिहाजा वर्तमान युग की तथाकथित जितनी भी तरक्की है वह प्राकृतिक नहीं है. हमने प्रकृति के शोषण का पाप किया है लिहाजा भीषण त्रासदियाँ पैदा होती हैं. हमने स्वतंत्रता को बाहर खोजने की कोशिश की है, लेकिन वह हमारे आचरण में नहीं है. हम या तो किसी के द्वारा शासित हैं या फिर किसी पर शासन करना पसंद करते हैं.