<?xml version='1.0' encoding='UTF-8'?><?xml-stylesheet href="http://www.blogger.com/styles/atom.css" type="text/css"?><feed xmlns='http://www.w3.org/2005/Atom' xmlns:openSearch='http://a9.com/-/spec/opensearchrss/1.0/' xmlns:georss='http://www.georss.org/georss' xmlns:gd='http://schemas.google.com/g/2005' xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'><id>tag:blogger.com,1999:blog-3760252429097979220</id><updated>2011-12-05T20:24:37.414-08:00</updated><title type='text'>मन की बात</title><subtitle type='html'>गुरू कहते हैं हमारे - रोजाना पाँच काम करने हैं 
१. सुबह उठकर व्यायाम करो. २. नाश्ता करो. ३. दोपहर को भोजन करो. ४. शाम को फिर व्यायाम करो. ५. रात को भरपेट भोजन करो.
यह पाँच काम कर लिये तो बाकी काम अपने आप हो जायेंगे.</subtitle><link rel='http://schemas.google.com/g/2005#feed' type='application/atom+xml' href='http://atmaramsharma.blogspot.com/feeds/posts/default'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3760252429097979220/posts/default?max-results=100'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://atmaramsharma.blogspot.com/'/><link rel='hub' href='http://pubsubhubbub.appspot.com/'/><author><name>Atmaram Sharma</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11944064525865661094</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://bp0.blogger.com/_ws8fvUK17cA/SIFlbEXxXJI/AAAAAAAAABo/-M-oWunBkdA/S220/atm+01+copy.gif'/></author><generator version='7.00' uri='http://www.blogger.com'>Blogger</generator><openSearch:totalResults>33</openSearch:totalResults><openSearch:startIndex>1</openSearch:startIndex><openSearch:itemsPerPage>100</openSearch:itemsPerPage><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3760252429097979220.post-3726871987794043161</id><published>2011-08-11T01:01:00.000-07:00</published><updated>2011-08-11T01:01:48.813-07:00</updated><title type='text'>पिंजरा</title><content type='html'>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जब होता है इंसान अवस / और जतन बेअसर / ऐसे कमज़ोर पलों में / भीतर से उपजते हैं समाधान &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div closure_uid_mufha9="112"&gt;कभी जब इच्छाएँ प्रकटती हैं / प्रबल और बेहिसाब / उन्हें बीन-फटककर / छानने-छाँटने का बनता है योग / तब बिखराव अचानक / प्रकट होता है / ऐसे कि जैसे / हाथों से छूट जाए सूप / और फर्श पर बिखर जाएँ / गेहूँ के दाने &lt;/div&gt;&lt;br /&gt;यूं तो बेवसी का दौरा / पड़ता है हर एक पर / कुछ हत भागे / गिरफ्त में रहे आते हैं / उम्रभर-ताजिंदगी &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div closure_uid_mufha9="113"&gt;कि जैसे / अचकन पड़ जाती है / पुरानी और गैरचलन / ठीक वैसे ही / कामनाएँ / छीजती हैं और / बासी भी पड़ती हैं &lt;/div&gt;&lt;br /&gt;बाहर का अनंत / खोजती है ऑंख / मगर भीतर का अँधेरा / नापना मुश्किल &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तुम्हारी अधमुँदी / कामना / जुगनू के माफिक / चमकती है अँधेरे में / उठता है हाथ / पकड़ नहीं पाता कुछ भी / खालीपन / हमेशा का साथी / आ चिपट जाता है / सीने से - सदा की तरह &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वो बनाती है तमाशा / मैं ढाँकता हूँ कमतरी / वो उकसाती है अकसर / मैं खर्चने से डरता हूँ / वह छू देती है नब्ज / और जगता है अहंकार / नृत्यरत हवाएँ / ठहर जाती हैं - औंचक &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उसे है चमक से लगाव / और गाँठ में बाँधने की चाह / गहरे तक उतर / खुशनुमा क्षणों को / वो अपनाना चाहता है &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यूँ नहीं करता वो / करने योग्य काम / गुजरे जमाने का दोगलापन / उसके रक्त में है शामिल / फिर करता है सवाल खुद से &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सुरक्षित जीवन नहीं चाहता मैं / जब अवसाद पहुँचाता है दु:ख / सुरक्षा जीवन को खत्म कर देती है &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उसे नहीं होता कभी / किसी बात पर अपराधबोध / इस शब्द पर / उसका नहीं है यकीन / वह अपने सहज / आवेगों के संग / जीना चाहता है &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कहता है वह / अपनी ही लौ में बहने में / कैसा अपराधबोध / किसी के बारे में / नैतिक निर्णय / वह नहीं लेता / और इस तरीके से वह / उन्मुक्त जीवन / जीना चाहता है &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उसने सीखा है जिंदगी से / खुश रहना खुद से / निजी चुनाव है / किसी का मज़ाक उड़ाना / किसी को तकलीफ पहुँचाना / नहीं है खुशी के बहाने &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जब वह होता है तार्किक / सहज आवेग और इच्छाएँ उभर आती हैं / लगता है उसे / तकलीफ बढ़ रही हैं उसकी &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ज्यादा लोग / हमेशा ही / जो चाहते हैं / कर नहीं पाते / तकलीफ में पड़ने का / यह भी एक है बहाना &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वह ज़िंदा रहना चाहता है / एकदम उन्मुक्त और आजाद / अगर यह मुक्ति न हो / उसे लगता है हर दम / वह है पिंजरे में कैद जानवर / कहता है वह / बंधन खोल दो / मैं मर जाना चाहता हूँ&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बात है मामूली / पर लगती है गूढ़ / गर वेदना और तकलीफ न हो / कोई कभी गलतियों से / सबक लेने को / राजी नहीं होता.&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3760252429097979220-3726871987794043161?l=atmaramsharma.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://atmaramsharma.blogspot.com/feeds/3726871987794043161/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3760252429097979220&amp;postID=3726871987794043161' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3760252429097979220/posts/default/3726871987794043161'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3760252429097979220/posts/default/3726871987794043161'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://atmaramsharma.blogspot.com/2011/08/blog-post.html' title='पिंजरा'/><author><name>Atmaram Sharma</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11944064525865661094</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://bp0.blogger.com/_ws8fvUK17cA/SIFlbEXxXJI/AAAAAAAAABo/-M-oWunBkdA/S220/atm+01+copy.gif'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3760252429097979220.post-2755664672951280320</id><published>2011-07-27T05:46:00.000-07:00</published><updated>2011-07-27T05:46:03.297-07:00</updated><title type='text'>जहाज कौ पंछी</title><content type='html'>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;&lt;div class="MsoNormal" style="margin: 0cm 0cm 0pt;"&gt;&lt;span closure_uid_1xkipg="96" lang="HI" style="font-family: Mangal; mso-bidi-language: HI; mso-hansi-font-family: &amp;quot;Times New Roman&amp;quot;;"&gt;जैसे उड़ि जहाज कौ पंछी पुनि जहाज पै आवै... मार्का विचारों को लिए दिये ब्लॉग पर लौटा हूं. इस बीत बहुतेरे पानी बह गया है. हालांकि - जल में कमल, कमल में जल है - मार्का जुमले भी याद आ रहे हैं. तो भी मन की बात जारी रहे, कोशिश करूंगा.&lt;/span&gt;&lt;span style="mso-bidi-font-family: Mangal; mso-bidi-language: HI;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3760252429097979220-2755664672951280320?l=atmaramsharma.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://atmaramsharma.blogspot.com/feeds/2755664672951280320/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3760252429097979220&amp;postID=2755664672951280320' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3760252429097979220/posts/default/2755664672951280320'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3760252429097979220/posts/default/2755664672951280320'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://atmaramsharma.blogspot.com/2011/07/blog-post.html' title='जहाज कौ पंछी'/><author><name>Atmaram Sharma</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11944064525865661094</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://bp0.blogger.com/_ws8fvUK17cA/SIFlbEXxXJI/AAAAAAAAABo/-M-oWunBkdA/S220/atm+01+copy.gif'/></author><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3760252429097979220.post-287296611570040455</id><published>2010-06-23T22:21:00.000-07:00</published><updated>2010-06-23T22:21:35.093-07:00</updated><title type='text'>दो पहलू</title><content type='html'>गाँव और शहर&lt;br /&gt;जैसे सिक्के के दो पहलू&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;गाँव शामिल है &lt;br /&gt;सदा से रक्त में&lt;br /&gt;और महानगर&lt;br /&gt;बदलता है चोला बार-बार&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;गाँव की गरीबी और &lt;br /&gt;शहर की झुग्गियों का फर्क&lt;br /&gt;नुमाया नहीं होता&lt;br /&gt;लावारिस और आवारापने के रंग&lt;br /&gt;गाँव और शहर के होते हैं जुदा&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;गाँव की दुनिया में पुजता था इंसान&lt;br /&gt;और मास्टरों को मिलती थी &lt;br /&gt;बेशुमार इज्जत&lt;br /&gt;बजता हारमोनियम &lt;br /&gt;होता नाच&lt;br /&gt;गिल्ली-डंडा खेलते बच्चे &lt;br /&gt;और होतीं कुश्तियाँ&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;गाँव की कविता-कहानी में&lt;br /&gt;खेत और फसल&lt;br /&gt;हल और बखर&lt;br /&gt;निंदाई और गुड़ाई &lt;br /&gt;फसल की कटाई &lt;br /&gt;दाँय और उड़ान &lt;br /&gt;महुआ और गुली&lt;br /&gt;बेर और कंडी &lt;br /&gt;क्या कुछ नहीं था&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जजमानी और प्रवचन &lt;br /&gt;रामलीला और नौटंकी&lt;br /&gt;रावला और बेडनी का नाच&lt;br /&gt;राई और दलदल घोड़ी &lt;br /&gt;और फिर बजता था रमतूला&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कोदों की रोटी फिर&lt;br /&gt;सतुआ और बिरचुन&lt;br /&gt;डुबरी और फरा या&lt;br /&gt;महेरी और लपटा&lt;br /&gt;चीला और सिमई&lt;br /&gt;लबदो और तसमई&lt;br /&gt;फिर खाते थे लोग रामदानें&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जलबिहार का मेला&lt;br /&gt;और ताजियों की फेरी&lt;br /&gt;मीलाद की बैठक और&lt;br /&gt;बजरोठी का रतजगा&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जाने कहाँ बिला गया&lt;br /&gt;वह जीता जागता दृश्य&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब शहर की झुग्गी में रहता है आदमी&lt;br /&gt;और चलता है पैदल&lt;br /&gt;पटियों पर बैठकर खाता है रोटी&lt;br /&gt;कभी अधपेटा रहा आता&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भौतिकता के तमाम सुख&lt;br /&gt;सड़क के पार जगमग हैं&lt;br /&gt;हालाँकि उसे सपने देखने से&lt;br /&gt;नहीं रोका जा सकता &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वह चोरी नहीं करता&lt;br /&gt;करने की सोचता है&lt;br /&gt;झूठ नहीं बोल पाता&lt;br /&gt;ऐन मौके पर गड़बड़ाता है&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वह बिना वजह &lt;br /&gt;उगलता है सच&lt;br /&gt;और छीनकर हासिल करने की &lt;br /&gt;उसकी कूबत नहीं&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नहीं सीख पाया वह&lt;br /&gt;चापलूसी करना &lt;br /&gt;और धोखा देना&lt;br /&gt;और माँगना उधार&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बुरे दिनों की छाया की मानिंद&lt;br /&gt;गाँव अब तक तारी है&lt;br /&gt;और लगता है उसे&lt;br /&gt;लौट जायेगा वह वहीं&lt;br /&gt;जहाँ से चला था&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक नौकरी&lt;br /&gt;रहने को छत&lt;br /&gt;बीबी और बच्चे&lt;br /&gt;थोड़ा-सा सुख&lt;br /&gt;थोड़ी-सी बचत&lt;br /&gt;और ढेर सारे सपने&lt;br /&gt;एक आदमी और क्या चाहता है ज़िंदगी से&lt;br /&gt;क्या इतना भर है&lt;br /&gt;जीवन का मतलब?&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3760252429097979220-287296611570040455?l=atmaramsharma.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://atmaramsharma.blogspot.com/feeds/287296611570040455/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3760252429097979220&amp;postID=287296611570040455' title='7 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3760252429097979220/posts/default/287296611570040455'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3760252429097979220/posts/default/287296611570040455'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://atmaramsharma.blogspot.com/2010/06/blog-post_23.html' title='दो पहलू'/><author><name>Atmaram Sharma</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11944064525865661094</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://bp0.blogger.com/_ws8fvUK17cA/SIFlbEXxXJI/AAAAAAAAABo/-M-oWunBkdA/S220/atm+01+copy.gif'/></author><thr:total>7</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3760252429097979220.post-7672925388423764871</id><published>2010-06-10T00:14:00.000-07:00</published><updated>2010-06-10T00:14:46.070-07:00</updated><title type='text'>शहर भोपाल</title><content type='html'>&lt;b&gt;मंज़ूर एहतेशाम&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह बड़ी लाचारी है कि खुद अपनी बात किये बिना आप अपने शहर को याद नहीं कर पाते। सिर्फ़ इतना ही नहीं, खुद तक पहुँचने के लिए पहले आपको अपने बुजुर्ग़ों की उँगली पकड़ना पड़ती है और बुज़ुर्गों का ज़िक्र उत्तर-आधुनिक आख्यान-सा लगता है, जो कभी-कभी, मन को भाते हुए भी, समझ सकने की क्षमता से अतीत लगता है।&lt;br /&gt;उस समय को याद करने की कोशिश करता हूँ, जहाँ शताब्दियों पूर्व मेरा जन्म हुआ था और जिसका नाम भी भोपाल ही था। समय के साथ सब कुछ इस सहजता से बदल गया है कि मेरे बुज़ुर्ग अगर लौट कर यहाँ आ सकें, तो चौतरफ़ नज़र दौड़ाने के बाद, बहुत-आश्चर्य या निराशा से, इसे पहचानने से इन्कार करते-करते शायद पहचान ही लेंगे।&lt;br /&gt;मैं बात वहीं से शुरू करता हूँ जहां से औपचारिक रूप से उसे शुरू होना चाहिए। मेरे अब्बा और शायद उनके पिता, यानी मेरे दादा भी। फिर, मेरी दोनों बेटियाँ भी यहीं जन्मीं। मैंने सीमांत प्रांत (एम.डब्ल्यू.एफ.पी., जो अब पाकिस्तान में है), सुवात और बुनेर (जो आजकल तालिबान और ओसामा लादेन का कार्यक्षेत्र और हेड-क्वार्टर हैं), और वहाँ के पठानों के किस्से भी, बचपन से सुनें हैं (वे लोग मेरे बुज़ुर्गों का ख़ानदान थे)। मेरे छोटे दादा का क़लमी-सफ़रनामा भी, जो उनका बाद के दिनों में वहाँ की यात्रा का दास्तान है, मेरे काग़ज़ात में सुरक्षित है। बचपन में लोगों की ज़बानी सुनने और आज खुद उस सफ़रनामे की टूटी-उर्दू तहरीर जोड़-तोड़ कर पढ़ने की कोशिश करते, यह सब कुछ एक जादुई वृतांत-सा ही लगता है। लेकिन, यह सब वहीं रहते हुए, जहाँ पैदा होकर मैं आज इस उम्र तक पहुँचा हूँ। यानी भोपाल में। खुद वहाँ जाने का ख्याल या अपने 'रिश्तेदारों' से मिलने का तसव्वुर मैंने कभी नहीं किया। &lt;br /&gt;अपने ख़ानदान का लम्बा शजर: (वंशवृक्ष) देखते और उसके बारे में पढ़ते, यह साफ़ हो जाता है कि हमारे बुज़ुर्गों के नाम पर, जो लोग फ्रंटियर से यहाँ आये और फिर यहीं बस भी गये कोई सैलानी या एडवॅचरर नहीं थे, बल्कि 'तलाशे मआश' यानी रोज़-रोटी की तलाश में उन्हें अपना आबाई वतन छोड़ने पर मजबूर कर दिया था। छोटे दादा की तहरीर के हर शब्द और वाक्य में भूख, गरीबी, बीमारी, जहालत, बड़बोलापन, घुटने मोड़े, तरह-तरह की शक्लें बनाए, शुरू से आख़िर तक एक जुलूस की शक्ल में फैले नज़र आते हैं। साथ ही हैरानी होती है कि इतनी पीढ़ियाँ यहाँ की ख़ाक का रिज्क बन चुकीं, लेकिन उनमें से किसी ने भी आज तक अपने होने का कोई बिगुल नहीं बजाया। हद यह कि शहर की तारीख में कोई नामीं-गिरामी गुण्डा या बदमाश तक पैदा नहीं किया। सब सहजतापूर्वक भूख, बेरोज़गारी, तपेदिक, गरीबी और अन्य-अन्य बीमारियों का शिकार होकर और मजबूरी और तंगहाली को मुकद्दर मानकर, निहायत मौतें मरते गए। जो उन्होंने पाया, वह सिर्फ एक टूटी-फूटी जिन्दगी जी लेने का सुख ही होगा। शायद।&lt;br /&gt;इसका मतलब यह नहीं कि भोपाल के तमाम लोगों की जिन्दगी इसी प्रकार की थी। हर्गिज नहीं। यहाँ हमारे परिवार से ज्यादा खुशहाल और उनसे कहीं ज्यादा बदहाल लोग, हमेशा-हमेशा रहे हैं। खुशहाली के दर्शन दुर्लभ थे, तो बदहाली चौतरफ बिखरी नजर आती थीं। हालाँकि उस जमाने में खुशहाली को बदहाली से उस तरह अलग करके देखना संभव नहीं था, जिस तरह आम तौर पर हो गया है। मध्य वर्ग की पहचान भी, उसके अनेकानेक क़िस्मों में बंट जाने से, सरल नहीं रही और ऊँचा वर्ग तो हमेशा एक पहेली रहा ही है। जो भी कहें, लेकिन आज बदहाली में भी, पहले की निस्बत खुशहाली की अदा तो शामिल है ही। यह दोधारी तलवार खास तौर पर हमारी आजादी के बाद और पिछले 20 सालों की विशेष उपलब्धि है।&lt;br /&gt;मैं जिस भोपाल में आज से कोई 60 साल पहले पैदा हुआ था, (वह रियासत भोपाल के बाद का, एक ज़माना था) उस के भी भीतर, एक 'शहर' भोपाल हुआ करता था, जिसमें हर जुमे की दोपहर, अब्बा नमाज़ पढ़ने, जामा मस्जिद जाया करते थे। उनकी अनुपस्थिति में, जब उनसे कोई मिलनेवाला घर आता, तो अम्मा, हम बच्चों से कहलवा देतीं-'अब्बा शहर गये हैं।' यही त्यौहार के मौके पर, जब हम लोगों को कपड़े-जूते की ख़रीददारी के लिए तांगे में बाज़ार ले जाया जाता- 'शहर चल रहे हैं।' दरअसल फ़सील और दीवारों के भीतर जो बसाहट थी, समय बीतने के साथ समझ में आया, उसे शहर कहा जाता था। उसके अनेक मुहल्लों, गली-कूचों में बसने वालों को ही शहरी कहलाये जाने का हक़ था और हमार घर-मुहल्ला, इस लिहाज़ से, उसमें शामिल नहीं था। हम उस इलाक़े के रहनेवाले थे जो किसी समय 'दरो-दीवार' वाले शहर से बाहर, उस तरह बसता गया था, जैसे आज के ज़माने में झोपड़-पट्टी। यहाँ रहने वाले, आमतौर पर कमज़ोर आर्थिक वर्ग से संबंधित थे और इन बस्तियों में वह सहूलतें, उस प्रकार उपलब्ध नहीं थीं जो शहर में थीं।&lt;br /&gt;सोचो, तो तब यह समूचा भोपाल, हथेली भर था, लेकिन याददाश्त में उसका फैलाव समन्द्रों जितना था। उस दुनिया के बरअक्स जो समय के साथ सिमटकर हथेली में समा गई है। यहाँ जो कुछ था, वह बाकी की दुनिया की तुलना में कैसा था, इससे बेपरवाह भोपाल की बाशिंदे अपने ताल-तलैयों, पहाड़-पहाड़ियों में मगन थे। व्यवसायिकता और व्यवसायिक रवैये की, आम जन के जीवन में, न जगह थी, न कल्पना।&lt;br /&gt;(मैं एक असंभव को, ऑंखें मूँद कर स्वीकार करता चल रहा हूँ, एक अतीत प्रेमी यही करता है। बीते समय को दोष-मुक्त कर, सारी खूबियाँ उससे जोड़ देता है। क्षमा नहीं, कृपया मुझे समझें।)&lt;br /&gt;आमतौर पर, शहर के खुशहाल लोग वह थे जिनके पास खेती की लम्बी-चौड़ी ज़मीनें थीं, क्योंकि ज़िन्दगी की ज्यादातर ज़रूरतें, घूम-फिर कर, खेतों, बागों और जंगलों से ही पूरी होती थीं। एक मध्य वर्ग वह था जिसका व्यवसाय जंगलों की ठेकेदारी और लकड़ी से संबंधित तिरजारत-आरामशीन, फर्रे, बुरादा, जोड़ी-चौखट और लकड़ी के फ़र्नीचर से जुड़ा था, तो दूसरा वह, जो थोड़ी बहुत खेती की ज़मीन का भी मालिक था, और दूध देनेवाले जानवर पालकर, दूध बेचने को भी अपनी आमदनी का ज़रिया बनाता था। लकड़ी के पीठे और भैंस के तबैले उस तुलनात्मक खुशहाल, मगर बुनियादी तौर पर अपढ़, मध्यवर्ग की जीविका के साधन थे, जो किसी अन्य प्रकार की दुकानदारी के उलझावे में नहीं पड़ना चाहता था। नौकरी गिनती के पढ़े-लिखों का हिस्सा थी, जिन्हें शायद सरकार की ओर से माकूल तनख्वाह मिल जाती होगी, क्योंकि मामूली बाबूगिरी भी देखी इज्ज़त की नज़र से जाती थी। या फिर उस तरह के लोग छोटी-मोटी प्राइवेट नौकरियाँ करते थे, जिनका गुज़र-बसर ही रोज़ की मेहनत-मज़दूरी पर था।&lt;br /&gt;शहर में धंधा करनेवाले और बड़े दुकानदार भी थे, लेकिन किसी उद्योग के नाम पे सिर्फ़ एक कपड़ा मिल का नाम सुनने में आता था। यह भी उसके अनियमित चाल-चलन और उसमें काम करनेवालों के रोज़गार पर लगने या बेरोज़गार हो जाने को लेकर। एक पुट्ठा मिल भी थी, लेकिन उस पर आश्रित लोगोें की संख्या इतनी नहीं थी कि शहर की आर्थिक आबो-हवा को प्रभावित कर पाती। एक बिजलीघर था, जो ऐसी 'खालिस' बिजली सप्लाई करता था, जो किसी को पकड़ ले तो छोड़ती नहीं थी।&lt;br /&gt;और क्या?&lt;br /&gt;दो अस्पताल थे, एक ज़नाना, एक मर्दाना, एक यूनानी शफ़ाखाना था, कुछ लड़के-लड़कियों के स्कूल, एक इन्टर-कॉलेज, तीन सिनेमाघर, एक बस स्टैण्ड और एक रेलवे-स्टेशन। कुछ गिनती के अखाड़े थे और एक हम्माम, जो हर साल जाड़ों में, गर्म होने का ऐलान करता था। सबसे अधिक तादात मस्जिदों की थी और उसके बाद नंबर आता था तालाबों का। सारे शहर में ताल-तलैयों का एक ऐसा जाल बिछा था कि पैदल चलते भी आप रह-रहकर किसी नये तालाब के किनारे होते थे। तालाबों से छूटो, तो पातरा थी, जिसका पानी बहता रहता था और जिसके घाटों पर धोबियों की भट्टियाँ लगती थीं, रस्सियाँ खींच कर शहर भर के धुले कपड़े फैलाये और सुखाये जाते थे। और हाँ, नर्मदा आइस फैक्ट्री को भला कैसे भूला जा सकता है, जहाँ गर्मियों में 'चमत्कारी' बर्फ बनती थी। आईसक्रीम के ठेले, साइकिल-रिक्शा की शक्ल के, शहर की सकरीं और गलियों में, 'आईस्क्रीम, नर्मदा फैक्ट्री', की ललचाने वाली आवाजें लगाते, घूमते थे। सफेद पेन्ट से पुता लकड़ी का बक्सा, उस पर मोटे लाल अक्षरों में लिखा- 'नर्मदा आईस्क्रीम।'&lt;br /&gt;शहर में पुरानी इमारतों और महलों का एक सिलसिला था जो देखरेख की कमी के कारण तेजी से खण्डहर होता जा रहा था या जहाँ पार्टीशन के बाद आये सिंधी-पंजाबी शरणार्थी रह रहे थे। उन शाही नामों की इमारतों का रंग-रोग़न, रोज-ब-रोज़, तेजी से उड़ता जा रहा था और उन्हीं की सेहत कुछ दुरुस्त थी, जिसमें स्कूल या सरकारी दफ्तर लगने लगे थे। शहर की फ़सील और दरवाजे, ऑंख में परछाईं की तरह तैरकर गायब हो जाते हैं, क्योंकि मेरे छुटपन में ही उन्हें आने वाले दिनों के ब्लू-प्रिंट के अनुसार, ढा दिया गया था। कुहड, जैसी जुमेराती गेट या ताजमहल के आसपास के मोखे, आज भी हैं, लेकिन जो शहर के बीचों-बीच हुआ करते थे, वह नहीं रहे। इन पुरानी इमारतों के अलावा शहर में दो या उससे ज्यादा मंजिल के मकान कम थे। आमतौर पर छोटे-छोटे घरों में भी सेहन और हरियाली, दरों-दीवार की ही तरह पाये जाते थे।&lt;br /&gt;अब सब मैं, उस मुट्ठी-भर शहर की कल्पना में, समन्दर से विस्तार को, समझा सकने की कोशिश में, याद करना चाह रहा हूँ।&lt;br /&gt;इस शहर की विशेषता ताल, पहाड़, बेगमात, गुटका बटवा इत्यादि के अलावा यहाँ मौजूद उर्दू शायरों की तादाद भी रही है। अल्लामा इक़बाल और जिगर मुरादाबादी का मेज़बान रह चुका भोपाल, खुद भी शायरी और शायरों का घर था। एक  फिज़ा और माहौल था, शायरी और उससे जुड़े चार-बेत क़व्वाली और बेतबाज़ी का यहाँ, इससे इन्कार नहीं किया जा सकता। शायरों और शिकार, यह दो तरह के बड़े लोगों के शौक़ थे। गद्यकार भी थे, लेकिन उनकी हैसियत उस प्रकार से आंक पाना, जैसे मुशायरों में शायरों की आंकी जाती शायद संभव नहीं था। धार्मिक विद्वानों के अलावा पत्रकार थे, राजनेता थे, गानेवालियों का लक्ष्मी टॉकीज का मुहल्ला था और हॉकी का खेल, जिसने देश को कई नामी खिलाड़ी दिये। सन् 1956 में मध्यप्रदेश की राजधानी बनने के क़ाफी समय बाद तक भी, 'भोपाली बोलचाल' का खुद अपना लबो-लह्जा था, जिसे भोपाली भाषा भी कह दिया जाए तो शायद ग़लत न होगा।&lt;br /&gt;मुल्ला रमूज़ी और उनकी 'गुलाबी उर्दू' का महत्व तो उन लोगों के लिए होगा जो बाक़ायदा उर्दू पढ़ते-लिखते थे, बरकतउल्लाह भोपाली को यहाँ और भी बाद में जाना गया। आम जनता को, जब तक मुद्दों को सियासी रंग न दे दिया जाए, ऐसे लोगों में न ख़ास दिलचस्पी थी और न है। अवामी सतह का नायक खान शाकिर अली खान था, जिसका संबंध कम्युनिस्ट पार्टी से था या फिर बाद में शंकरदयाल शर्मा, जिन्हें देश का राष्ट्रपति बनने का गौरव प्राप्त हुआ।&lt;br /&gt;उन परिवर्तनों में जो मैंने यहाँ अपनी ऑंखों के सामने देखे, मौसमों में आया बदलाव सबसे अप्रिय लगता है। ऐसा नहीं कि यहाँ गर्मी नहीं पड़ती थी-खूब पड़ती थी। दिन तपते और लू भी चलती थी। वैसी नहीं जो दिल्ली-यू.पी. में चलती थी। लेकिन रातों को खुशगवारी दिन की थकान मिटा देती थी। अब मौसमों का असन्तुलन बढ़ गया है। इस पर वह भी सहमत हैं, जिनके पास हर तरह के मौसम में लड़ सकने के कवच और साधन हैं, और जो आज शहर भोपाल की उस सीमा से बहुत दूर, खुले में रहते हैं, जो मेरे बचपन में फ़सीलों से तय थी, उससे बहुत आगे जहाँ कभी हमारा मुहल्ला-छावनी विलायतियान हुआ करता था। शायद एक ही सकून है कि यह ख़राबी दूसरे शहरों की निस्बत कम है।&lt;br /&gt;भोपाल समय के साथ पहले धीमी गति और फिर तेजी से बदला है। बाकी दुनिया की ही तरह। इसके फैलाव में वह पुराना शहर आज एक छोटा-सा हिस्सा है, जो अपनी सूरत-शक्ल वैसी ही बनाए रखने में नाकाम है। जनसंख्या बढ़ी है (तीस-चालीस हज़ार से पन्द्रह-बीस लाख।) ताँगे-साईकिलों के जगह पेट्रोल-डीजल से चलने वाले वाहनों ने ले ली है, औद्योगिक क्षेत्रों का भरपूर विकास हुआ है और अपनी प्राकृतिक-भौगोलिक विशेषताओं के साथ, यह जिन्दगी की दौड़ में पूरी तरह शामिल है। जिस तरह कभी मेरे पूर्वज आये थे, बाद में यहाँ लाखों आये हैं और बस गए हैं। आज देश के नक्शे में यह शहर नुमायाँ है, वह भारत भवन के कारण हो, मानव-संग्रहालय तथा अन्य-अन्य महत्वपूर्ण संस्थानों की वजह से या अनेक पर्यटन स्थलों के कारण जो इसके इर्द-गिर्द सजते-संवरते गए हैं।&lt;br /&gt;यहाँ की नयी बस्तियाँ भी उन सारे सुख-साधनों से परिपूर्ण हैं जो इस स्तर पर बढ़ते शहर में उपलब्ध होना चाहिए। देखते ही देखते यह शहर देश के महत्वपूर्ण और गिनती के शिक्षा केन्द्रों में शामिल हो गया है जहाँ पत्रकारिता से लेकर मेडिकल साइंस और इंजीनियरिंग के अनेकानेक कॉलेज और संस्थाएं हैं और जहाँ दूर-दूर से छात्र जमा होते हैं अपने भविष्य को तय करने के लिए।&lt;br /&gt;एक ज़माना था जब यह माना जाने लगा था कि भोपाल, देश की सांस्कृतिक राजधानी बनने जा रहा है और लोगों के ऐसा सोचने के पीछे, वह सब था, जो कवि-आलोचक-प्रशासक अशोक वाजपेयी ने 1972 के बाद भोपाल में, इस क्षेत्र में, योजनाबध्द तरीके से किया था। शुरू में उन्हें सब का सहयोग भी मिला लेकिन, धीरे-धीरे विरोध का सामना भी करना पड़ा। भारत भवन जिसे लोग कलाओं का घर कहते हैं, आज भी है, मगर उसकी छवि कुछ अजीब प्रकार से धूमिल पड़ी हैं और वह महत्व जो उसे नब्बे की दहाई तक प्राप्त था, कभी का खत्म हो चुका है। कला हो या साहित्य, भोपाल का मामला सीधे जवानी से बुढ़ापे का सा लगता है और सहमति-विरोध अपनी जगह, सच यह है कि अशोक वाजपेयी के 'हाथी' से दूसरा कोई उपयोगी कम नहीं ले सका, सजावट के लिए तो जो आता है, वह इस्तेमाल करने की कोशिश करता ही है।&lt;br /&gt;तो यह है, संक्षेप में, वह भोपाल जिसे मैंने देखा जाना। सत्येन कुमार, शानी, दुष्यंत त्यागी, शरद जोशी, सोमदत्त, फ़जल ताबिश और किसी दम के लिए निर्मल वर्मा, कृष्णा सोबती, दिलीप चित्रे, कृष्ण बलदेव वैद और जे. स्वामीनाथन तथा वी.बी. कारथ तथा विजय मोहन सिंह का भोपाल। बड़े लोग किसी एक जगह रुक कर कहाँ बैठते हैं। इन लोगों के जाने के बाद भी लोग भोपाल में हैं, लेकिन वह इस तरह, बिना कोशिश किये, याद नहीं आ पाते।&lt;br /&gt;शायद कुछ बेहतर हो और भोपाल का कलाजगत भी उसी अनुपात में फैले-बढ़े, जैसे यह बाक़ी शहर इसी दुआ के साथ।&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: x-small;"&gt;'अकार' अप्रैल से जुलाई 2009 में संकलित&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: x-small;"&gt;मंज़ूर एहतेशाम&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: x-small;"&gt;1973  में प्रकाशित 'रमजान में मौत' मंज़ूर एहतेशाम की पहली कहानी थी और 1976 में 'कुछ दिन और' नाम से आपका पहला उपन्यास प्रकाशित हुआ था। 'सूखा बरगद' के लिए आपको श्रीकांत वर्मा पुरस्कार से सम्मानित किया गया। राही मासूम रज़ा की तरह ही मंज़ूर एहतेशाम ने अपनी रचनाओं के माध्यम से अल्पसंख्यक समुदाय को यर्थाथवादी ढंग से प्रस्तुत किया है। भारतीय भाषा परिषद, वीरसिंह देव सम्मान के साथ पहल सम्मान से भी सम्मानित। वर्ष 2000 में शिखर सम्मान के साथ 2003 में भारत सरकार द्वारा पद्मश्री से सम्मानित किया गया।&lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3760252429097979220-7672925388423764871?l=atmaramsharma.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://atmaramsharma.blogspot.com/feeds/7672925388423764871/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3760252429097979220&amp;postID=7672925388423764871' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3760252429097979220/posts/default/7672925388423764871'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3760252429097979220/posts/default/7672925388423764871'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://atmaramsharma.blogspot.com/2010/06/blog-post.html' title='शहर भोपाल'/><author><name>Atmaram Sharma</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11944064525865661094</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://bp0.blogger.com/_ws8fvUK17cA/SIFlbEXxXJI/AAAAAAAAABo/-M-oWunBkdA/S220/atm+01+copy.gif'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3760252429097979220.post-7123937403412334967</id><published>2010-03-30T04:22:00.000-07:00</published><updated>2010-03-30T04:22:29.538-07:00</updated><title type='text'>अरे! ओ अजनबी</title><content type='html'>वो है यारों का यार&lt;br /&gt;शायद ही करे कोई इनकार&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उसके बारे में हरेक के पास हैं - दसियों वाकये&lt;br /&gt;कि वह बोलता है कम&lt;br /&gt;और सुनता है ज्यादा&lt;br /&gt;करो तारीफ तो - बदल देता है बात&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;चार यार सहमत हों &lt;br /&gt;ऐसा कम होता है&lt;br /&gt;पर उसका जिकर आते ही&lt;br /&gt;सब होते हैं एक सुर&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वो - बगैर बोले कहता है&lt;br /&gt;बिना सुने समझता है&lt;br /&gt;बहुतेरे हैं उसकी &lt;br /&gt;इसी अदा के मुरीद&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आहिस्ता से उठती है उसकी बात&lt;br /&gt;और मुलामियत से पाती है विस्तार&lt;br /&gt;उसकी खिलंदड़ मंडली में शामिल हैं&lt;br /&gt;विचारवान और उन्मुक्त आस्थावान&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उसके संगी साधक हैं &lt;br /&gt;विरल और अलबेले&lt;br /&gt;मानो दुनियावी विविधता के &lt;br /&gt;बेफ्रिक नुमाइंदे&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वे करते हैं सवाल - तो लगता है&lt;br /&gt;जबाव दे रहे हैं - और&lt;br /&gt;जबावों से पैदा होते हैं&lt;br /&gt;फिर-फिर नये सवाल&lt;br /&gt;कदाचित इस तरह वे खोजते हैं&lt;br /&gt;मौज के बहाने&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यूँ वहाँ अनेकों हैं पदवीधारी&lt;br /&gt;पर नामों और सम्बोधनों का रुतबा&lt;br /&gt;नहीं चलता वहाँ&lt;br /&gt;पद और प्रतिष्ठा के चोचले&lt;br /&gt;'एकांत' की झाड़ियों में&lt;br /&gt;टंगे दिखते हैं अनुशासनबध्द&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;रतजगे की खुमारी में&lt;br /&gt;डूबते-उतराते चेहरे&lt;br /&gt;जब होते हैं नमूदार&lt;br /&gt;और हल्की-सी जुम्बिश&lt;br /&gt;कि शुरुआती कदमताल&lt;br /&gt;पकड़ती है जब धारदार लय&lt;br /&gt;जीवन-आनंद बिखरता है चारों ओर&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पूछा उससे किसी ने&lt;br /&gt;सही क्या है - गलत क्या है&lt;br /&gt;कहा उसने :&lt;br /&gt;जो चाहो करो&lt;br /&gt;सब ठीक है तब तक&lt;br /&gt;जब तक यह न भूलो&lt;br /&gt;तुम्हारी पहली और आखिरी &lt;br /&gt;प्रतिबध्दता अपनी प्रतिभा से है&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तुम किसी के बेटे नहीं&lt;br /&gt;किसी के बाप नहीं&lt;br /&gt;किसी के पति नहीं&lt;br /&gt;किसी के प्रेमी नहीं&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तुम केवल तुम हो&lt;br /&gt;और उतने भर हो&lt;br /&gt;जितना तुम अपने&lt;br /&gt;'तुम होने' के नाते करते हो&lt;br /&gt;बाकी दुनियावी कचरा है&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कभी किसी रोज़&lt;br /&gt;कहा था उसने&lt;br /&gt;जीवन का मकसद है&lt;br /&gt;मौज करना&lt;br /&gt;ऐसी अनेकों धारणाएँ&lt;br /&gt;वह सहज ही करता है उजागर&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अच्छा करने की पहली सीढ़ी है &lt;br /&gt;अच्छा सोचना&lt;br /&gt;और वह अपनी&lt;br /&gt;दुधारी तलवार&lt;br /&gt;इस्तेमाल ही नहीं करता&lt;br /&gt;'हितकर' होना ही&lt;br /&gt;उसकी है अहम व्याख्या&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यूँ करने योग्य&lt;br /&gt;गिनवाता है वह - पाँच काम &lt;br /&gt;पहला-वर्जिश&lt;br /&gt;दूसरा-जलपान&lt;br /&gt;तीसरा-भोजन&lt;br /&gt;चौथा-फिर व्यायाम&lt;br /&gt;और अंत में फिर भोजन&lt;br /&gt;कहता है वह&lt;br /&gt;ये पाँच काम कर लिये&lt;br /&gt;बाकी अपने आप हो जाएँगे&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अति-विनयी हमारी परम्परा&lt;br /&gt;बड़ाई को करती है खारिज &lt;br /&gt;और फलदार पेड़ का झुकाव&lt;br /&gt;महिमा पाता है&lt;br /&gt;यही कारण है कि उसका&lt;br /&gt;अनूठा स्वभाव&lt;br /&gt;बखान नहीं पाता&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उसके बरतावों की ऑंच&lt;br /&gt;कायम रखती है दोस्ताना&lt;br /&gt;आदतन की मिजाजपुर्सी&lt;br /&gt;खिलाती है अनेकों रंग&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वे होंगे कोई और&lt;br /&gt;जो हो उठते हैं अधीर&lt;br /&gt;उसके नक्शे-कदम&lt;br /&gt;वजनदारी से उठते हैं&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पाँत के नुमाइंदों के&lt;br /&gt;सरोकार हो सकते हैं जुदा&lt;br /&gt;पर उसकी पनाह में आके&lt;br /&gt;होते हैं सभी एकसुर&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;चली बात इम्तहान की&lt;br /&gt;तो वह था अव्वल&lt;br /&gt;फिर चलना हो रस्सी पर&lt;br /&gt;कि निभाना हो वादा&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उसकी बातों में &lt;br /&gt;नहीं है निराशा&lt;br /&gt;नहीं है जीवन की असफलता&lt;br /&gt;उसे कहीं नहीं जाना है&lt;br /&gt;उसे कुछ नहीं पाना है&lt;br /&gt;फिर क्यों चिंतित हुआ जाए&lt;br /&gt;फिर क्यों कुछ कहा जाए&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अक्सर ही वह &lt;br /&gt;हो जाता है मौन&lt;br /&gt;तब चेहरे पर उसके&lt;br /&gt;उभरती है स्मित मुस्कान&lt;br /&gt;कि जैसे ऍंधेरी रात में&lt;br /&gt;चमक उठता है कोई तारा&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;शहर-दर-शहर&lt;br /&gt;पायेंगे आप उसके मुरीद&lt;br /&gt;उसकी सहजता है चुम्बकीय&lt;br /&gt;जो दुनियावी दोगलेपन पर&lt;br /&gt;पड़ती है भारी&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उसकी आभा की गिरफ्त&lt;br /&gt;छोड़ती है अमिट छाप&lt;br /&gt;तब उसके ख्यालभर से&lt;br /&gt;आप जिंदादिली गुनते हैं&lt;br /&gt;उससे मिलने का विचार बुनते हैं&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कभी किसी रोज़&lt;br /&gt;उसके जेहन में भी&lt;br /&gt;उठते हैं - स्याह और कमतर विचार&lt;br /&gt;तब सोचता है वह &lt;br /&gt;पानी की बरबादी की मानिंद&lt;br /&gt;शब्दों का भी होता है दुरुपयोग&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कहा था उसने कि वह&lt;br /&gt;छिपकलियों से करता है बात&lt;br /&gt;तिलचट्टे और बतखें &lt;br /&gt;बतियाती हैं उससे घण्टों&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सुबह-सुबह जब&lt;br /&gt;फुनगी पर बैठी मैना&lt;br /&gt;करती है उससे ऑंखें दो-चार&lt;br /&gt;उसका बिंदासपना&lt;br /&gt;अनेकों बार हो जाता है अबूझ&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;खुद उसे नहीं पता&lt;br /&gt;क्यों कर वह&lt;br /&gt;नृत्यरत पंखे में&lt;br /&gt;खोजता है बचपना&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सर्दियों की काली रातें&lt;br /&gt;जब हो जाती हैं लम्बी और दुरूह&lt;br /&gt;तब परछाईयों के घेरे&lt;br /&gt;उसमें भरते हैं जोश&lt;br /&gt;ठीक वैसे ही जैसे&lt;br /&gt;जब लच्छेदार बातों&lt;br /&gt;और खोखली तारीफों&lt;br /&gt;को सुनते हुए वह&lt;br /&gt;'हूँ-हूँ' की भरता है हुँकार&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अक्सर ही&lt;br /&gt;कदमताल की आवाजें&lt;br /&gt;उसे याद दिलाती हैं&lt;br /&gt;मिर्चों का तीखापन&lt;br /&gt;और हुसैन सागर की खटास&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सत्ता की गलियों में पसरा अजनबीपन&lt;br /&gt;और कुंद करता यथा-स्थितिवाद&lt;br /&gt;जब-तब उसे&lt;br /&gt;भरा देता है छटपटाहट से &lt;br /&gt;ऐसे में उसकी ऑंखें&lt;br /&gt;खोजती हैं गीलापन&lt;br /&gt;और लोहे की लकीरों पर&lt;br /&gt;दक्षिण की ओर से आती हुई&lt;br /&gt;ज़िंदगी&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;शब्दों से है उसे प्रेम&lt;br /&gt;और अक्षरों की कतारों में&lt;br /&gt;नज़र आता है छुटपना&lt;br /&gt;रूठना और मनाना&lt;br /&gt;खेलना और बतियाना&lt;br /&gt;फिर-फिर लौटना अतीत में&lt;br /&gt;जहाँ उसने पढ़े थे पाठ&lt;br /&gt;कुछ सबसे उपयोग-दु-रुपयोग&lt;br /&gt;किए शब्दों के&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वह ठस होकर ठहरता नहीं&lt;br /&gt;जकड़ता नहीं शब्दों से&lt;br /&gt;उसके साथ&lt;br /&gt;जकड़ना कहीं भी नहीं है&lt;br /&gt;आप उसे जानते हैं 'ब्रदर'&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तंद्रा में चलते लोग&lt;br /&gt;और दुखियारे चेहरे&lt;br /&gt;क्यों कर लगते हैं उसे &lt;br /&gt;एक-से&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सोचता है वह यूँ ही&lt;br /&gt;हममें से हरेक&lt;br /&gt;होना चाहता है क्यों-कर महान&lt;br /&gt;सिर्फ और सिर्फ&lt;br /&gt;शब्दों का करके इस्तेमाल&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;निर्विकार रहकर करूँ&lt;br /&gt;दायित्व-निर्वहन&lt;br /&gt;या कर गुजरूं इनके लिए&lt;br /&gt;औकात से ज्यादा&lt;br /&gt;सोचता है वह - और&lt;br /&gt;भीतर से आती है आवाज़&lt;br /&gt;तटस्थ रहकर भी&lt;br /&gt;बहुत किया जा सकता है?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पैबन्द लगाऊँ कहाँ तक&lt;br /&gt;यह चादर तो तार-तार है&lt;br /&gt;अपने गिर्द उसे&lt;br /&gt;अदृश्य सीमाएँ महसूसती हैं&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दिलासा देते हुए हर बार&lt;br /&gt;हौसला बढ़ता है उसका&lt;br /&gt;जानते हैं नरम दिल लोग&lt;br /&gt;दिलासा भी तो&lt;br /&gt;राहत का है पहला पायदान&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कभी जब वह &lt;br /&gt;होता है उदास&lt;br /&gt;उसे ख्याल आता है&lt;br /&gt;डयूटी पर तैनात अर्दली&lt;br /&gt;वो जो सुबहो-शाम&lt;br /&gt;निभाता है हुकुम&lt;br /&gt;घर में - किचिन में&lt;br /&gt;कार में - दफ्तर में&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यदा-कदा सोचता है वह&lt;br /&gt;कहाँ तक निभा पाया &lt;br /&gt;अपने दायित्व&lt;br /&gt;कभी लगता है उसे&lt;br /&gt;समंदर में बहती धार के बीच&lt;br /&gt;वह बड़ी मछली के साथ भर है&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उमंग से भरा वह चेहरा&lt;br /&gt;बहुत कुछ था वहाँ देखने काबिल&lt;br /&gt;थी वहाँ पच्चीस साला उपलब्धियाँ&lt;br /&gt;लियाकत के तमाम नतीजे&lt;br /&gt;और थी एक तड़प&lt;br /&gt;जो औंचक ही उभर आती&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यूँ तो हरेक इंसान एक कहानी है&lt;br /&gt;थोड़े कम लोग उपन्यास होते हैं&lt;br /&gt;लेकिन एक कविता में&lt;br /&gt;समा जाती है पूरी दुनिया&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कविता का स्पेस अनंत है&lt;br /&gt;ऐसा ही अनकहा बहुतेरा&lt;br /&gt;उसके चेहरे पर उभरता था&lt;br /&gt;वहाँ एक कविता&lt;br /&gt;शब्द खोजती थी&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ऐसी कविता &lt;br /&gt;कि जिसका आकार था अतुकांत&lt;br /&gt;कि जिसकी लय थी पानीदार&lt;br /&gt;ऑंख का आईना &lt;br /&gt;कि जिसमें तस्वीर दिखे ज़िंदा&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;किस्सा यों बढ़ा कि बोला वह&lt;br /&gt;आओ अजनबी - विराजो यहाँ&lt;br /&gt;कि देखो मैंने दुनियावी वर्गभेद की&lt;br /&gt;दीवारें ढहा दी हैं&lt;br /&gt;औकात तौलने के तराजू&lt;br /&gt;कब के टूट चुके हैं&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सो आओ मित्रो&lt;br /&gt;खोजें उस अजनबी को&lt;br /&gt;जो बैठा है यहाँ मौन&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कहता है सबसे&lt;br /&gt;बैठो, मैं प्रस्तुत हूँ!&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3760252429097979220-7123937403412334967?l=atmaramsharma.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://atmaramsharma.blogspot.com/feeds/7123937403412334967/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3760252429097979220&amp;postID=7123937403412334967' title='3 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3760252429097979220/posts/default/7123937403412334967'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3760252429097979220/posts/default/7123937403412334967'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://atmaramsharma.blogspot.com/2010/03/blog-post.html' title='अरे! ओ अजनबी'/><author><name>Atmaram Sharma</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11944064525865661094</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://bp0.blogger.com/_ws8fvUK17cA/SIFlbEXxXJI/AAAAAAAAABo/-M-oWunBkdA/S220/atm+01+copy.gif'/></author><thr:total>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3760252429097979220.post-3881319968281821580</id><published>2010-01-21T03:30:00.000-08:00</published><updated>2010-01-21T03:30:21.236-08:00</updated><title type='text'>साहित्यिक सुख</title><content type='html'>देश में शादियों का मौसम चरम पर पहुँचकर गुजरा है. इस दौरान तरह-तरह की पातियों और कार्डों से बाजार भरे पड़े थे. इस सुखद मौके के बहाने लोगों ने अपनी कलात्मक और साहित्यिक अभिरुचि को जाँचा-परखा और अभिव्यक्त किया. एक ज़माना वह भी था जब हल्दी-चावल छींट कर नेह-निमंत्रण हाथ से लिखे जाते थे और आम लोगों को खबास और खास लोगों को खुद अपने हाथों सौंपने में फक्र महसूस किया जाता था.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब नये ज़माने का चलन प्रदर्शनकारी है और इस मौके पर लोग लगे हाथों साहित्य-सृजन का सुख भी लूट लेना चाहते हैं. कार्डों के साहित्यिक पहलू की विवेचना ज्ञानी करेंगे, फिलहाल कार्डों पर छपी इबारत के कुछ नमूने पेश हैं :&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;- सुख समृध्दि का होगा अर्जन, जब होगा तेल श्रीगणेश पूजन.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;- बड़ी अनूठी रीत है, प्यारी-सी सौगात, मंडप में होंगे खड़े ले मामाश्री भात.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;- सात फेरे सात वचन होंगे जब स्वीकार, परिपूर्ण होगा तभी पाणिग्रहण संस्कार.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;- जब जायेगी घर ऑंगन से बेटी की डोली, आप हम सबकी होंगी ऑंखें गीली.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;- हल्दी है चन्दन है रिश्तों का बंधन है, हमारी दीदी की शादी में आप सभी का अभिनंदन है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;- हमें इंतज़ार है आपके आने का, स्मरणीय हैं ब्रह्मा, विष्णु, महेश, साथ होंगे आप और हम, साक्षी होंगे धरा, अम्बर, अरुण, वरुण एवं अग्नि, सुअवसर होगा परिणय सूत्र के अटूट बन्धन का.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;- आपका शुभागमन एवं स्नेहभरा आशीर्वाद, नव-जीवन में प्रविष्ट होने वाले, इन पथिकों के लिए अमूल्य उपहार होगा, हम आपके आगमन के लिए आतुर रहेंगे.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;- दुनिया का नियम है, हमने भी निभाया है, अपनी बिटिया को आज दुल्हन बनाया है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;- वर्षों से रखा था, जिस संभालकर, दे रहे हैं उसे हृदय से निकालकर.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;- खुशी है, थोड़ा दर्द हो रहा है, बेटी होती है पराई, आज अहसास हो रहा है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;- परिणय सूत्र बंधन के आनंद उत्सव पर हम सत्कार की थाली में, चन्दन-सा आदर, कुमकुम-सी आस्था, पुष्प-सा प्रेम, अक्षत और समर्पण लिए आपके स्वागत हेतु प्रतीक्षारत हैं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;- सोचो मत आना है, रिश्तों को निभाना है, मेरे चाचा की शादी में महफिल को खुशियों से सजाना है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;- अनुरोध : कृपया समयाभाव के कारण निमंत्रण पत्र को ही व्यक्तिगत उपस्थिति मानकर पधारने की कृपा करें.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;गाँव देहात की एक पुरानी कहावत है - एक थे राम एक रावणना, उननें उनकी नारि हरी, उनने उनको नाश करो, बात थी केवल इतनी सी और तुलसी लिख गए पोथन्ना.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यानी सरस तरीके से देशज समाज बड़ी और मूल्यवान बातें भी दो लाइन में समेट लेता है. लेकिन आज का तथाकथित मध्यवर्ग! उसकी थाह पाना बहुत मुश्किल है. उसका कोई भरोसा नहीं कि वह कब और कहाँ आधुनिक होकर पुरानी परम्पराओं को कूड़ा बताये या फिर उन्हें थाती से लगाये. वे शादी के कार्ड बनाते समय साहित्यिक हो जाते हैं और ऐसा मानते हैं कि जो कार्ड जितने भारी और कठिन शब्दों से भरा-पूरा होगा - उसकी उतनी ही धाक जमेगी. हालाँकि यह खुशफहमी भर होती है, क्योंकि सिवाय तारीखें देखने के शायद ही कार्ड को कोई गंभरता से पढ़ता होगा.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कड़वा सच यह भी है कि हिन्दी समाज में पढ़ने की आदत लगातार खत्म होती जा रही है. अखबार के पन्नों को पढ़ लेना ही बड़ी बात समझी जाने लगी है. गुजरे जमाने में कम से कम कथा-पोथी और सत्संग के बहाने शब्दों की ताकत और महिमा कायम थी, लेकिन अब न शब्दों में वह असर पैदा होता है और न वैसे सरोकार बचे हैं. बस एक तरह का अर्थहीन शब्दों का सिलसिला चल पड़ा है.&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3760252429097979220-3881319968281821580?l=atmaramsharma.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://atmaramsharma.blogspot.com/feeds/3881319968281821580/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3760252429097979220&amp;postID=3881319968281821580' title='3 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3760252429097979220/posts/default/3881319968281821580'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3760252429097979220/posts/default/3881319968281821580'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://atmaramsharma.blogspot.com/2010/01/blog-post_21.html' title='साहित्यिक सुख'/><author><name>Atmaram Sharma</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11944064525865661094</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://bp0.blogger.com/_ws8fvUK17cA/SIFlbEXxXJI/AAAAAAAAABo/-M-oWunBkdA/S220/atm+01+copy.gif'/></author><thr:total>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3760252429097979220.post-1040067442944514394</id><published>2009-12-19T05:48:00.000-08:00</published><updated>2009-12-19T05:48:54.594-08:00</updated><title type='text'>नफरत के बीज</title><content type='html'>तीसरी कक्षा में पढ़ने वाली मेरी बेटी ने मुझे एक गाना सुनाया. मैंने सुना और हँस दिया. गाने पर आप भी गौर करें -&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;(सुनो गौर से दुनिया वालो, बुरी नज़र न हम पर डालो, चाहे जितना ज़ोर लगा लो) की तर्ज पर गाना था -&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सुनो गौर से दुनिया वालो&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;फटे दूध की चाय बना लो&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;शक्कर-पत्ती कुछ न डालो&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पीने वाले होंगे पाकिस्तानी&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हमने बनायी है, तुम भी पियो...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस गाने में - पाकिस्तानी - शब्द उसके दिमाग में कहाँ से आया? यह सवाल है. मैं जिस शहर में रहता हूँ वह पूरी दुनिया में गैस कांड के नाम से भी जाना जाता है और गैस कांड में हजारों मासूमों को जान गंवानी पड़ी. गैस त्रासदी के लिए जिम्मेदार देश के लिए मेरी बच्ची के दिमाग में कुछ भी नकारात्मक नहीं है? क्यों? जबकि पाकिस्तान हमारे साथ क्या-कुछ कर रहा है, वह अर्द्धसत्य ही ज्यादा है और जगजाहिर है कि राजनैतिक सच्ची तस्वीर उजागर होने के खिलाफ रहते है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बच्चों के दिमाग में अनजाने ही बोए गए नफरत के इन बीजों की फसल कैसी होगी? सोच कर दिल काँप उठता है.&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3760252429097979220-1040067442944514394?l=atmaramsharma.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://atmaramsharma.blogspot.com/feeds/1040067442944514394/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3760252429097979220&amp;postID=1040067442944514394' title='10 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3760252429097979220/posts/default/1040067442944514394'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3760252429097979220/posts/default/1040067442944514394'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://atmaramsharma.blogspot.com/2009/12/blog-post.html' title='नफरत के बीज'/><author><name>Atmaram Sharma</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11944064525865661094</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://bp0.blogger.com/_ws8fvUK17cA/SIFlbEXxXJI/AAAAAAAAABo/-M-oWunBkdA/S220/atm+01+copy.gif'/></author><thr:total>10</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3760252429097979220.post-9014986529630717502</id><published>2009-09-04T02:28:00.000-07:00</published><updated>2009-09-04T02:30:25.007-07:00</updated><title type='text'>भरा-पूरा इंसान</title><content type='html'>उन्हें पढ़ते हुए अक्सर ही ईर्ष्यालु हो उठता हूँ कि देखो 94 साल के बुजुर्गवार किस कदर ज़िंदगी के मज़े उड़ा रहे हैं. रोज़ दो पेग शैम्पेन और बढ़िया स्कॉच पीते हैं. महिला-मित्रों और तमाम नामी लोगों के किस्से चटकारे लेकर लिखते हैं. दुनियाभर की खुशफ़हम बातें सुनाते हैं और खुद गुड़ खाकर दूसरों को गुलगुले खाने की सलाह देते हैं. हैं न कमाल के ज़िंदादिल इंसान.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बात कर रहा हूँ मशहूर हस्ती खुशवंत सिंह के बारे में, जिनके लिखे को मैं बेहद पसंद करता हूँ. उनके हफ्तावार छपने वाले कॉलम को हर हाल में पढ़ता हूँ. चुनाचे मैं उनका मुरीद हूँ और चंद प्रेरणास्पद लोगों की सूची में उन्हें अव्वल दर्जे पर रखता हूँ. अब सवाल है कि फिर क्योंकर उनसे ईर्ष्या होती है. तो वो ये कि किस कदर ज़िंदादिली भरी है इस इंसान में. दुनिया जहान के बोझों से मुक्त. ज़िंदगी को खालिस मज़ा उठाने की चीज़ मानते हुए उनका फलसफा एकदम साफ है. यह जीवन रोने-बिसूरने के लिए नहीं है - यह तो मौज़ करने के लिए है. इसका मतलब यह कतई नहीं है कि दुनिया को लेकर उनका रवैया गैर जिम्मेदाराना है. जब जरूरत पड़ती है वो दुनियावी मुद्दों पर बगैर लाग-लपेट के अपनी राय जाहिर करते हैं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कुल जमा इतना भर कि उनके लिखे को बाँचकर खुशी मिलती है और ईर्ष्या इसलिए कि उनके जैसा साफ और बेबाक लिखने का हुनर कहाँ से पैदा होता है, नहीं जानता. हालाँकि वे मूल तौर पर अँगरेजी में लिखते हैं (पक्के तौर पर नहीं जानता) और हिन्दी में अनुवाद होकर छपता है. शायद इसीलिए खुशवंत सिंह को पढ़ते हुए वैसा घरोवा महसूस नहीं होता जैसा हिन्दी के नामी और दीगर लेखकों को पढ़कर होता है. उनके लिखे की दिलेरी की एक वजह शायद अँगरेजी में लिखे जाने की वजह से भी पैदा होती है. अँगरेजी हमें हिम्मती बनाती है - बहुत-सी बातों, परम्पराओं, धारणाओं से मुक्त करती है. यह बात केवल अँगरेजी के साथ ही नहीं दुनिया की तमाम दीगर भाषाओं पर लागू हो सकती है. यानी आप मातृभाषा से इतर किसी भी भाषा में लिखेंगे तो अतिरिक्त दिलेरी अपने आप आ जायेगी. हालाँकि नामी रचनाकारों ने मातृभाषा में भी अद्भुत लिखा और नये मिथ-मुहावरे गढ़े हैं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हालाँकि अपने सुदीर्घ जीवन में खुशवंत सिंह ने भी कथनी और करनी के द्वैत का सामना किया होगा. बहुतेरे लोग उन्हें करीब से जानते होंगे, लेकिन मुझ जैसे उनके पाठक-प्रशंसक उनके बारे में उतना ही जानते हैं जितना उन्होंने अपने बारे में बताया या कि फिर उनकी किताबों, संस्मरणों या आत्मकथा से बयान हो सका. यहाँ जिक्र लाज़िमी है कि हिन्दी के पाठकों को खुशवंत सिंह के बहुआयामी व्यक्तित्व को जानने के लिए उनके नामी उपन्यास 'दिल्ली' का उषा महाजन द्वारा किया गया अनुवाद जो 1994 में प्रकाशित हुआ था, से खासी मदद मिलती है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उनके कुछ निष्कर्ष जो मैं समझ सका :&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;फूल खिलता है तो वह किसी के पास नहीं जाता कि तुम मेरी सुंदरता को देखो, मेरी खुशबू महसूस करो. लोग स्वयं ही फूल की खासियतों की वजह से उसके पास पहुँचते हैं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अपनी शक्ति पहचानो और ऊर्जावान बनो. लेकिन बनोगे कैसे? क्योंकि हमारी दृष्टि तो केवल दूसरों पर ही बनी रहती है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अक्सर लोग अपने अंदर के खोखलेपन से भयभीत होकर दोहरेपन का पर्दा लगा लेते हैं. वे चाहते हैं कि हमारे खालीपन को कोई देख न सके और यहीं से शुरू होता है छिपाव का सिलसिला जो ज़िंदगी को नरक में तब्दील होने तक चलता रहता है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लोग कहते हैं कि उन्होंने अपने समाज, अपने परिवार और अपने बेटों के लिए क्या नहीं किया, लेकिन सभी लोग समय गुजरने के साथ कृतघ्नी हो गए. दगाबाजी याद रखने की वजह से लोग दुखी होते रहते हैं, जबकि हमें लोगों के द्वारा दी गई मदद को याद करके खुश होते रहना चाहिए.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बहरहाल, एक भरे-पूरे इंसान की बातों से दर्जनों सूक्तियाँ निकाली जा सकती हैं.&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3760252429097979220-9014986529630717502?l=atmaramsharma.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://atmaramsharma.blogspot.com/feeds/9014986529630717502/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3760252429097979220&amp;postID=9014986529630717502' title='24 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3760252429097979220/posts/default/9014986529630717502'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3760252429097979220/posts/default/9014986529630717502'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://atmaramsharma.blogspot.com/2009/09/blog-post.html' title='भरा-पूरा इंसान'/><author><name>Atmaram Sharma</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11944064525865661094</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://bp0.blogger.com/_ws8fvUK17cA/SIFlbEXxXJI/AAAAAAAAABo/-M-oWunBkdA/S220/atm+01+copy.gif'/></author><thr:total>24</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3760252429097979220.post-725317545394016829</id><published>2009-08-12T04:06:00.000-07:00</published><updated>2009-08-12T04:08:46.096-07:00</updated><title type='text'>कीमती संदर्भ</title><content type='html'>पिछले दिनों अथर्ववेद पर प्रख्यात विद्वान करपात्रीजी की टीका पढ़ रहा था। हालाँकि इस टीका में उन्होंने कहीं भी ऐसा दावा नहीं किया है कि अथर्ववेद की उनकी यह मौलिक व्याख्या है। टीका की भूमिका में - कवि न होऊँ, नहिं चतुर कहावउँ - वाली विनम्रता ही उजागर हो पाती है। खैर.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हरेक के भीतरर् कत्ता (करने वाला) और दृष्टा (देखने वाला या तटस्थ या वह जिसे गाँधीजी आत्मा की आवाज़ कहते हैं) का द्वंद्व लगातार चलता रहता है. कुछ तथ्य हैं जिन पर गौर करें :&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जीवन में उच्च भौतिक उपलब्धियों को हासिल करने के बाद अचानक व्यर्थताबोध का भाव प्रबल हो उठता है, लगता है कि नाहक ही इसकी खातिर इतना श्रम, इतने संसाधन खर्च किये गये.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दूसरी ओर विकट बुरी दशा में, जब कोई वश नहीं चलता, अचानक से हम शांत हो जाते हैं - सारा विरोध और कुछ कर गुजरने की सारी बेचैनी गायब हो जाती है, कि जैसे हम परिस्थिति के हाथों खुद को छोड़ देते हैं. कुल निष्कर्ष यह कि भीतरी दुनिया में दो का द्वंद्व लगातार जारी है। कभी एक सक्रिय होकर दूसरे पर भारी पड़ता है तो कभी दूसरा पहले पर.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अथर्ववेद का ऋषि कहता है : मैं अमृतमयी वाणी बोलूं, मेरी जिह्वा के अग्रभाग में माधुर्य हो, जिह्वा के मूल में माधुर्य का स्त्रोत हो, मेरे कर्म, बुध्दि, विचार और चित मधुसिक्त हों. यह ऋषि द्वारा माधुर्य प्राप्ति के लिए ईश्वर से की गई प्रार्थना है. माधुर्य ही इस सृष्टि में आनंद लोक के निर्माण में उत्प्रेरक का कार्य कर सकता है. वास्तव में आनंद का उद्गम स्थल तो हमारा हृदय ही है, परंतु जीवन की मधुरता आनंद के इस उद्रेक को बढ़ाती है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सुख से आगे की स्थिति है आनंद. सुख की सीमाएं हैं, परंतु आनंद किसी सीमा बंधन में नहीं बंधता. आनंद अपार होता है. प्रेम, सहानुभूति, दया, करुणा, सौहार्द और सहिष्णुता आनंद को बढ़ाने वाली प्रवृत्तियां हैं. इसी प्रकारर् ईष्या, द्वेष, घृणा और इनसे उत्पन्न होने वाली उत्तेजना, आवेश और क्रोध हमारे भीतर आनंद के कलश को खाली कर देते हैं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;करपात्री जी आनंद की व्याख्या करते हुए लिखते हैं :&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वास्तव में आनंद, जीवन के प्रति हमारे दृष्टिकोण पर निर्भर करता है.र् ईष्या के दो स्वरूप माने गए हैं. यदिर् ईष्या स्वस्थ प्रतिद्वंद्विता को जन्म देती है और मानव के उत्थान में सहायक होती है, तो इसेर् ईष्या का सकारात्मक स्वरूप कहा जाएगा. परंतु यदिर् ईष्या दूसरे की उन्नति से हमारे भीतर द्वेष उत्पन्न करती है तो यहर् ईष्या का नकारात्मक स्वरूप कहलाएगा. ईष्या से ही द्वेष की भी उत्पत्ति होती है और द्वेष दूसरे को केवल हानि ही नहीं पहुंचाता बल्कि हमारे आनंद को भी दग्ध करता है. दूसरे को हानि पहुंचाने पर व्यक्ति स्वयं भी मलिनता से ग्रस्त रहता है, ठीक उसी प्रकार जैसे क्रिया की प्रतिक्रिया होना अवश्यंभावी है. दुर्भावनाएं,र् ईष्या और द्वेष की पूरक हैं और हमारे भीतर आवेश और क्रोध का संचार करती हैं. कहा गया है किर् ईष्यालु का अन्त:करण मृतप्राय हो जाता है. आवेश और उत्तेजना, व्यक्ति के अन्तस को अनुभूतियों से रिक्त कर देती हैं और वह व्यक्ति क्रोध और प्रतिशोध को ही जीवन का ध्येय बना लेता है.&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3760252429097979220-725317545394016829?l=atmaramsharma.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://atmaramsharma.blogspot.com/feeds/725317545394016829/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3760252429097979220&amp;postID=725317545394016829' title='13 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3760252429097979220/posts/default/725317545394016829'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3760252429097979220/posts/default/725317545394016829'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://atmaramsharma.blogspot.com/2009/08/blog-post_8776.html' title='कीमती संदर्भ'/><author><name>Atmaram Sharma</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11944064525865661094</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://bp0.blogger.com/_ws8fvUK17cA/SIFlbEXxXJI/AAAAAAAAABo/-M-oWunBkdA/S220/atm+01+copy.gif'/></author><thr:total>13</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3760252429097979220.post-4337714497350357164</id><published>2009-08-02T09:01:00.000-07:00</published><updated>2009-08-02T09:02:48.111-07:00</updated><title type='text'>छवि और भय</title><content type='html'>कह डालने से क्यों डरते हो?&lt;br /&gt;क्यों स्थगित करते हो&lt;br /&gt;आज को कल पर&lt;br /&gt;तब कि जब&lt;br /&gt;माँजते थे रकाबियाँ&lt;br /&gt;गंदे और सड़े होटल में&lt;br /&gt;और देखते थे ख्वाब&lt;br /&gt;कि जब होऊँगा कदवान&lt;br /&gt;कह जाऊँगा सब कुछ...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब कि जब&lt;br /&gt;परछाईं भी बताती है&lt;br /&gt;पाँच-फुटा तो हो ही&lt;br /&gt;पर अब तुम्हें&lt;br /&gt;कह जाने के लिए&lt;br /&gt;ताड़-सा कद चाहिए...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नहीं-नहीं कद तो बहाना है&lt;br /&gt;असल में तुम कायर हो&lt;br /&gt;और अपनी छवि से भयभीत हो...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अपनी छवि जो बसी है&lt;br /&gt;तुम्हारी अपनी ऑंखों में&lt;br /&gt;कह जाने से वह दरकेगी&lt;br /&gt;वह दरक भी सकती है&lt;br /&gt;इस संभावना मात्र से&lt;br /&gt;तुम काँप उठते हो...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उबरो अपनी छवि के मायावी घेरे से&lt;br /&gt;कल कि जब निश्चित ही&lt;br /&gt;होगा तुम्हारा तिया-पाँचा&lt;br /&gt;क्यों नहीं अपने हाथों&lt;br /&gt;चीर डालते अपना हृदय...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;क्यों नहीं फोड़ते वह ठीकरा&lt;br /&gt;जिसमें भरी हैं&lt;br /&gt;सड़कर बजबजातीं&lt;br /&gt;मिठास-भरी पूर्व-स्मृतियाँ...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कि जैसे हगना-मूतना स्वाभाविक है&lt;br /&gt;ठीक वैसे ही&lt;br /&gt;भीतर भरी काली इच्छाएँ&lt;br /&gt;उत्सर्जित होनी चाहिए...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;और फिर पूरी संभावना है&lt;br /&gt;कि उस गटर-गंगा में&lt;br /&gt;मिल जाए एकाध मोती&lt;br /&gt;जो किसी के तो क्या&lt;br /&gt;शायद तुम्हारे ही काम आ जाए...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;चेतो कि अपनी गढ़ी छवियों से&lt;br /&gt;डरने वाले लोग&lt;br /&gt;निश्चय ही मारे जाएँगे&lt;br /&gt;और जिएँगे वे अनंतकाल तक&lt;br /&gt;जो अपनी छवि को फिर-फिर&lt;br /&gt;तोड़ेंगे और लगातार तोड़ते रहेंगे...&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3760252429097979220-4337714497350357164?l=atmaramsharma.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://atmaramsharma.blogspot.com/feeds/4337714497350357164/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3760252429097979220&amp;postID=4337714497350357164' title='8 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3760252429097979220/posts/default/4337714497350357164'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3760252429097979220/posts/default/4337714497350357164'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://atmaramsharma.blogspot.com/2009/08/blog-post.html' title='छवि और भय'/><author><name>Atmaram Sharma</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11944064525865661094</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://bp0.blogger.com/_ws8fvUK17cA/SIFlbEXxXJI/AAAAAAAAABo/-M-oWunBkdA/S220/atm+01+copy.gif'/></author><thr:total>8</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3760252429097979220.post-2106232358642239153</id><published>2009-06-26T04:54:00.000-07:00</published><updated>2009-06-26T04:57:39.686-07:00</updated><title type='text'>अपराधबोध</title><content type='html'>जानकार ऐसा कहते हैं कि हमारा राष्ट्रीय चरित्र विक्टोरियन अपराधबोध से पीड़ित है - एक ऐसी मानसिकता जो हमारे आचार-व्यवहार में दिखाई देती है, जो हमें उन्मुक्तता के साथ प्रदर्शित होने में बाधा बनती है. हमारा खान-पान, जीवनशैली सभी इससे संचालित होते हैं. हमारे सम्पूर्ण चरित्र पर यह शैली हावी हो गयी है. एक 'गिल्ट' है जो सर्वत्र व्याप्त है. एक अघोषित आचरण हम सब पर छा गया है. दुनिया के बहुतेरे समाजों में जो उल्लास-उमंग और जिजीविषा दिखाई देती है वह हमारे यहाँ सिरे से गायब है. कोई भी अवसर हो 'गिल्ट' की यह वृत्ति तत्काल वहाँ उपस्थित हो जाती है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मातु-पिता-गुरु-प्रभु की बानी, बिना विचारि करिय शुभ जानी.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हमारे यहाँ विचारवान बनने पर ज्यादा जोर नहीं है. हमें अनुसरण करने की सीख बचपने से दी जाती है. यही कारण है कि भक्तिभाव का ज्यादा जोर हमारे स्वभाव में यों घुल-मिल गया है कि जैसे दूध में पानी. यूँ लगता है कि हमारा पूरा समाज वीतरागी बन गया है - जैसे उदासी समाज है. यूँ तो हमारा समाज उत्सवप्रिय है. उत्सवधर्मिता हमारी जीवनशैली है, लेकिन अब ये दो विपरीत ध्रुव हैं. एक तरफ उत्सवप्रियता है दूसरी तरफ अधिसंख्य सामाजिक दायित्वों के प्रति उदासीनता का भाव. हमारे अधिकांश उत्सव समाज की सन्निकटता को उजागर करते हैं. पर यह सन्निकटता या मेल-मिलाप एक खास तरह की रस्मों को निभाने की तरह हो जाता है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जीवन में बिना कीमत कुछ भी हासिल नहीं होता. बेकीमत सिर्फ शरीर मिला है और विचार भी बेकीमत उठते हैं. विचार जब आचरण में बदलते हैं तब वे मूल्यवान हो जाते हैं, लेकिन ये बड़ा श्रमसाध्य और पीड़ाजनक कार्य है. मन और शरीर को बड़ी तकलीफ होती है. विचारों का आवेग पानी जैसा है- सतत प्रवाहमान. उसे अगर रोका गया तो वह दाएँ-बाएँ फैलने लगता है. एक तरह से अवरोध को तोड़ने की ताकत इकट्ठी करना शुरू कर देता है. किसी भी विचार को अगर बाधित किया जाए तो मन को बेचैनी से भर देता है, अस्तु विचारों की स्वतंत्रता महत्वपूर्ण है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जीवों में मनुष्य ही ऐसा है जिसने स्वतंत्रता के साथ परतंत्रता का स्वाद चखा है और बयान किया है वरना प्रकृति में सभी स्वतंत्र हैं, मनुष्य को छोड़कर. इसलिए हमारा अंतस बेचैन है. विकासक्रम में हम आगे इसलिए हैं क्योंकि हमने किसी हद तक प्रकृति के नियमों को तोड़ा है. यह तरक्की बंधन पैदा करती है. यह बंधन सुख के साथ दुख भी देता है. सुविधाएँ हमें आरामतलब बनाती हैं. वे हमें बाँधती हैं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;प्रकृति में जितने अवयव हैं वे सब स्वतंत्र हैं इसलिए स्वतंत्रता प्राकृतिक है. चिड़ियाँ उड़ने को स्वतंत्र हैं, पेड़ झूमने को स्वतंत्र हैं, लेकिन आदमी हँसने को स्वतंत्र नहीं है. हमने गरीब-अमीर शब्दों का आविष्कार किया है और खाई बनायी है. असमानता हमने पैदा की है. कहा जा सकता है कि वनमानुषों का समाज कई अर्थों में समरस था. लेकिन विकास का चक्र उल्टा नहीं घूमता. लिहाजा वर्तमान युग की तथाकथित जितनी भी तरक्की है वह प्राकृतिक नहीं है. हमने प्रकृति के शोषण का पाप किया है लिहाजा भीषण त्रासदियाँ पैदा होती हैं. हमने स्वतंत्रता को बाहर खोजने की कोशिश की है, लेकिन वह हमारे आचरण में नहीं है. हम या तो किसी के द्वारा शासित हैं या फिर किसी पर शासन करना पसंद करते हैं.&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3760252429097979220-2106232358642239153?l=atmaramsharma.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://atmaramsharma.blogspot.com/feeds/2106232358642239153/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3760252429097979220&amp;postID=2106232358642239153' title='12 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3760252429097979220/posts/default/2106232358642239153'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3760252429097979220/posts/default/2106232358642239153'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://atmaramsharma.blogspot.com/2009/06/blog-post_26.html' title='अपराधबोध'/><author><name>Atmaram Sharma</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11944064525865661094</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://bp0.blogger.com/_ws8fvUK17cA/SIFlbEXxXJI/AAAAAAAAABo/-M-oWunBkdA/S220/atm+01+copy.gif'/></author><thr:total>12</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3760252429097979220.post-432356871488777072</id><published>2009-06-24T05:41:00.000-07:00</published><updated>2009-06-24T05:44:12.555-07:00</updated><title type='text'>हिंदी के पारस पत्थर</title><content type='html'>मुझे उसके पिता के बारे में पता नहीं था, पर उसके भाई को मैं जानता था. बचपने में ही सही मैंने उस पर एक लम्बी कविता लिखी थी. उसे देख मैं आज भी गहरीर् ईष्या में डूबने-उतराने लगता हूँ. उसका लिखा हुआ कोई महान साहित्य होगा, स्वयं वह भी इस बात पर शायद ही इत्तेफाक रखता हो. उसका एक कहानी संग्रह मैंने पढ़ा है. किस कदर उबाऊ और कठिन है, बताना मुश्किल है. अतुकांत कथा, कहीं से शुरू होगी, कहीं खत्म. उसका दावा है कि यह भविष्य का पाठ है. बातों की तरह उसकी कहानी में भी विशिष्ट बने रहने का आतंक बना रहता है. एक कृत्रिमता लगातार बनी रहती है. लिखता वह हिंदी में है, पर अधिकांश बातें अँगरेजी में करता है. अँगरेजी में बात करने से रौब के साथ-साथ विश्वसनीयता बरकरार रही आती है. अँगरेजी आज के समय की देवभाषा है. पूरी दुनिया का पता नहीं पर हमारे यहाँ आज भी श्रेष्ठी-वर्ग में इसे रौब-दाब के तौर पर इस्तेमाल किया जाता है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उसकी बोली-बानी मीठी और विचार तार्किक हैं. शब्दों का चयन और उनका उच्चारण बेलाग है. यह सलीका उसने परिवार के बड़ों से सीखा है. इसे उसने शुरूआती सफलता के मंत्रों की तरह रटा होगा. पहले प्रभाव में रोचकता पैदा हो इसमें बातचीत का लहजा महत्वपूर्ण भूमिका अदा करता है. बोलने का उसका ढंग, उसकी विद्वता उजागर करता है. अपने को वह बहुत कंजूसी से खर्च करता है. बहुतेरे अपने आप को बाल्टी के पानी जैसा उड़ेल देते हैं कि अगर सिर से पाँव तक सराबोर हो जाए, पर बाल्टी के पानी का भीगा, सूखने भी जल्दी लगता है. वह अपने आप को चिलमची की टोटी से निकलने वाली पतली धार की तरह खोलता है. अपने को उलीचने की उसे कोई जल्दबाजी नहीं. जितनी देर वह रिसता है, अगला उतनी देर तक उसके प्रभाव में बना रहता है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उसके पास सिलसिलेवार किस्से हैं, जिन्हें वह एक के बाद एक सुनाता जाता है, हँसता कम हँसाता ज्यादा है. अगले के मर्म को छूने के लिए वह बातों के पैंतरे आजमाने से नहीं चूकता. यही कारण है कि उसके पुरुष मित्रों की अपेक्षा महिला मित्र अधिक हैं. वह सुदर्शन न सही, उसका व्यक्तित्व चुंबकीय है. वह उच्च शिक्षा प्राप्त है. इसका वह बहुत कम इजहार करता है. वह जो भी लिखता है उसे इतिहास में दर्ज होना है, ऐसा उसके निकट मित्र कहते हैं. वे यह भी कहते हैं कि उसे अपने बड़े भाई के कारण साहित्य में बड़ा नुकसान उठाना पड़ा. यानी लम्बे समय तक उसे रचनाकार के तौर पर स्वीकार नहीं किया गया, बल्कि उसके भाई की ख्याति को उसके साथ चस्पा किया जाता रहा है. पर सच यह भी है कि उसे अपने भाई की ख्याति का लाभ भी बहुत मिला है, वरना उस जैसै क्रांतिकारी रचनाकार दर्जनों की संख्या में चप्पलें फटकारते घूम रहे हैं साहित्य सदन के बाहर.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उसकी एक छवि साहित्य-सदन के जुगाडुओं के तौर पर भी रही है. जिस नैतिकता की वह बात लिखते हुए करता है. वह उसके आचरण में कहीं दिखाई नहीं देता है. जिन दोगले कामों के लिए वह समाज को कोसता है, स्वयं भी वह वैसे काम करने में उसे गुरेज नहीं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सत्ता में रहकर उसकी मुखालफत करना तलवार की धार पर चलने जैसा है. वह ऐसी किसी तलवार की धार पर नहीं चलता. वह सुविधाभोगी मीठा क्रांतिकारी रचनाकार है. अबूझ किस्म की कविताएँ, कहानियाँ, हाईकू लिखता है और हर तीसरी लाईन में अँगरेजी में लिखे-पढ़े जाने को 'कोड' करके अपनी विद्वता बखान करता है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इन दिनों वह पारस पत्थर बनने के दौर में गुजर रहा है. कल जब वह पारस बन चुकेगा और अपने भाई की खाली छोड़ी जगह पर विराजेगा तो बहुतेरे पत्थरों को स्पर्श करके उन्हें सोना बनाने में समर्थ होगा.&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3760252429097979220-432356871488777072?l=atmaramsharma.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://atmaramsharma.blogspot.com/feeds/432356871488777072/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3760252429097979220&amp;postID=432356871488777072' title='8 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3760252429097979220/posts/default/432356871488777072'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3760252429097979220/posts/default/432356871488777072'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://atmaramsharma.blogspot.com/2009/06/blog-post_24.html' title='हिंदी के पारस पत्थर'/><author><name>Atmaram Sharma</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11944064525865661094</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://bp0.blogger.com/_ws8fvUK17cA/SIFlbEXxXJI/AAAAAAAAABo/-M-oWunBkdA/S220/atm+01+copy.gif'/></author><thr:total>8</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3760252429097979220.post-231999951554927333</id><published>2009-06-23T04:15:00.000-07:00</published><updated>2009-06-23T04:18:57.850-07:00</updated><title type='text'>छबीली</title><content type='html'>उनके दफ्तर में उन्हें लेकर कई तरह की चर्चाओं का बाजार गर्म रहता है. वे कब आती हैं, क्या करती हैं उनसे कोई नहीं पूछता. लेकिन उनकी काया बताती है कि ब्यूटीपॉर्लर वे नियमित जाती हैं. दिनोंदिन उनकी उमर घट रही है और कई बरस पहले दिखती प्रौढ़ता अब वे नाजुकता में बदलती जा रही है. अपनी इस नाजुकता की वे बहुत सम्हाल करती हैं. इस उम्दा निखार का राज पूछने पर पहले वे मुस्काती हैं फिर राज खोल कर बताती हैं- 'लॉफिंग क्लास' ज्वॉइन कर ली है, उसी का नतीजा है. फिर जोरदार ठहाका हा.. हा.. हा.. और अलविदा हो जाती हैं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उनसे नित नयी खुशबू आती है. किसिम-किसिम के परफ्यूम उनके पर्स में मौजूद रहते हैं. दसियों 'आसामियों' पर वे इसके जरिए रुतबा जमा चुकी हैं. उनसे जलने वाले इसे उनका छिछोरा काम मानते हैं. वे निश्छलता के साथ दूसरों की फिकर हवा में उछाल देती हैं. और 'आई डोंट केयर' मार्का अदा फेंकती हैं. वे हमेशा लकदक बनी रहती हैं और अपनी विशिष्टता को कायम रखने का इसे औजार मानती हैं. संघर्षभरे दिन उन्होंने भी देखे हैं, जब उन्हें नियम से काम करने पड़ते थे. रोजनदारी की नीरस जिम्मेदारियाँ उनके नाम भी थीं. हफ्ते में एकाध दिन उन्हें भी देर तक रुककर काम करना पड़ता था. खूसट टाइप का उनका बॉस उन्हें बेवजह अपने सामने बिठाए रखता था. बॉस का मानना था कि महिलाओं को साड़ी पहनकर ऑफिस आना चाहिए, इस कारण उन्हें अक्सर ही साड़ी पहनना पड़ती.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;काम में वे हमेशा औसत रहीं. जिस काम के लिए उनकी भर्ती हुई, उससे जुड़े तमाम कामों को वे सीख चुकीं और सहजता से कर लेती थीं. उन्होंने यह भी सीखा कि 'काम करना' और 'साबित करना' दो अलग-अलग बातें हैं. यह आवश्यक नहीं कि अच्छा काम करने से होता है, अच्छा काम साबित करके दिखाने से भी होता है. उन्होंने यह कला भी सीख ली थी. पहले पहल उन्होंने काम की महत्ता को समझा. सीरियस होकर काम किया. पर धीरे-धीरे वे यह समझ गईं कि काम करने से ज्यादा उसे प्रस्तुत करने में नंबर ज्यादा मिलते हैं. काम कोई भी करे, उसे प्रस्तुत करने उन्हें ही जाना चाहिए.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बॉस उनकी सोहबत पसंद करता है, इस सच्चाई को उन्होंने धीरे-धीरे स्वीकारना शुरू कर दिया था और तेजी से उनमें बदलाव होने लगे. अब वे मौसम के हिसाब से साड़ियों के रंगों का चयन करने लगीं. हफ्ते में कुछ दिनों बालों को बाँधकर आने लगीं. यह सब इसलिए होने लगा क्योंकि साहब को पसंद है. साहब के घरेलू मुद्दों पर भी वे धीरे-धीरे बात करने लगीं. साहब पर कौन से रंग के कपड़े ज्यादा फबते हैं, वे यह भी तय करने लगीं. साहब की घरेलू खरीददारी में भी उनका सहयोग बढ़ने लगा और ज्यों-ज्यों वे वहाँ व्यस्त होने लगीं ऑफिस की जिम्मेदारियों से उन्हें मुक्ति मिलने लगी.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वे धाराप्रवाह अंगरेजी बोलती हैं और कई बार भूल जाती हैं कि सुनने वाले को ठीक से हिंदी भी समझ नहीं आती. बोलने के अलावा काम करवाने की कला भी उन्हें आती है. कई बार चपरासियों से भी वे मीठे बोल बोलती पायी गईं. वे काम से काम रखने वाली हैं और बेवजह बात करना उन्हें फिजूल लगता है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सीखने की उनमें जबरदस्त इच्छाशक्ति है. हर वह काम जिसमें फायदा संभावित है उसे सीखने की लगन वे पैदा कर लेती हैं. उनका सम्पूरन व्यक्तित्व सीख-सीख कर ही बना है. एक तरह से वे भारतीय संविधान हैं. फर्क इतना है कि भारतीय संविधान में सर्वजन हिताय - सर्वजन सुखाय की भावना प्रबल है, जबकि उनके भीतर स्वयं की सुख-सुविधा और रुतबा कैसे लगातार बढ़ता जाए इस बाबत उन्होंने चुन-चुनकर दुनियादार और कामयाब लोगों की आचार-व्यवहार को अपने में आत्मसात कर लिया है. थोड़ी-थोड़ी जानकारी वे हर क्षेत्र की रखती हैं. वे लिखती हैं, पढ़ती हैं, प्रस्तुत होना जानती हैं. कुल मिलाकर उनके तरकश में किस्म-किस्म के तीर मौजूद रहते हैं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वे नये जमाने की सफल किरदार हैं और उनके बारे में लोग 'ऑंखों की भाषा' में बात करतें हैं.&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3760252429097979220-231999951554927333?l=atmaramsharma.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://atmaramsharma.blogspot.com/feeds/231999951554927333/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3760252429097979220&amp;postID=231999951554927333' title='8 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3760252429097979220/posts/default/231999951554927333'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3760252429097979220/posts/default/231999951554927333'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://atmaramsharma.blogspot.com/2009/06/blog-post_23.html' title='छबीली'/><author><name>Atmaram Sharma</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11944064525865661094</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://bp0.blogger.com/_ws8fvUK17cA/SIFlbEXxXJI/AAAAAAAAABo/-M-oWunBkdA/S220/atm+01+copy.gif'/></author><thr:total>8</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3760252429097979220.post-7731238168367342600</id><published>2009-06-05T05:53:00.000-07:00</published><updated>2009-06-05T05:54:49.459-07:00</updated><title type='text'>पहेली</title><content type='html'>&lt;span style="font-size:130%;color:#330099;"&gt;बहुत बुरा लगता है तब&lt;br /&gt;और अच्छा लगता है जब&lt;br /&gt;क्यों कर उपजती है कविता&lt;br /&gt;अबूझ है यह सवाल&lt;br /&gt;उसी से ठंडा - उसी से गरम मार्का.&lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3760252429097979220-7731238168367342600?l=atmaramsharma.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://atmaramsharma.blogspot.com/feeds/7731238168367342600/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3760252429097979220&amp;postID=7731238168367342600' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3760252429097979220/posts/default/7731238168367342600'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3760252429097979220/posts/default/7731238168367342600'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://atmaramsharma.blogspot.com/2009/06/blog-post.html' title='पहेली'/><author><name>Atmaram Sharma</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11944064525865661094</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://bp0.blogger.com/_ws8fvUK17cA/SIFlbEXxXJI/AAAAAAAAABo/-M-oWunBkdA/S220/atm+01+copy.gif'/></author><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3760252429097979220.post-1180271410281047527</id><published>2009-04-25T01:04:00.000-07:00</published><updated>2009-04-25T01:07:06.909-07:00</updated><title type='text'>ओ पिता हमें क्षमा करना</title><content type='html'>आत्मा बेच आया हूँ&lt;br /&gt;और उदास हूँ&lt;br /&gt;ओ पिता हमें क्षमा करना.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पूछो कितने में?&lt;br /&gt;तो सौदा बहुत सस्ता था&lt;br /&gt;अनमोल नगीना&lt;br /&gt;बेमोल बिक गया&lt;br /&gt;बेकीमत ही समझो&lt;br /&gt;चंद सुविधाएँ&lt;br /&gt;चंद बेफ्रिकी&lt;br /&gt;और महीने की पगार&lt;br /&gt;बस यही मोल था&lt;br /&gt;एक अदद ज़मीर का.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आत्मा थी जागृत&lt;br /&gt;तो थीं तमाम दिक्कतें&lt;br /&gt;बेवजह उठ खड़े होते थे सवाल&lt;br /&gt;कुछ अच्छा तो&lt;br /&gt;बहुत कुछ बुरा लगता&lt;br /&gt;भीतर जैसे&lt;br /&gt;आग भभक उठती थी&lt;br /&gt;अब किस्सा ही खत्म&lt;br /&gt;न बची आत्मा&lt;br /&gt;न उठेगा सवाल.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सोचता हूँ अब चैन में रहूंगा&lt;br /&gt;कुछ भी होता हो&lt;br /&gt;सही-गलत के प्रश्न&lt;br /&gt;अब न उठेंगे&lt;br /&gt;उचित अनुचित का फर्क&lt;br /&gt;अब न होगा&lt;br /&gt;क्या ऐसा हो पायेगा?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ओ पिता&lt;br /&gt;इसी दुनिया और इसी समय में&lt;br /&gt;तुमने मिसाल कायम की थी&lt;br /&gt;एक साम्राज्य के खिलाफ&lt;br /&gt;आत्मा को ज़िंदा रखा था&lt;br /&gt;और विजय पाई थी&lt;br /&gt;भय पर - क्रोध पर - इच्छाओं पर&lt;br /&gt;क्या यही भाव&lt;br /&gt;इंसान को कमजोर नहीं बनाते?&lt;br /&gt;और वह करता है समझौते&lt;br /&gt;सिलसिलेवार&lt;br /&gt;कभी न खत्म होने वाली&lt;br /&gt;लिप्साओं की खातिर&lt;br /&gt;रोज़-रोज़ मरता है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ओ पिता&lt;br /&gt;तुम्हारे पथ पर&lt;br /&gt;तमाम लोग चले हैं&lt;br /&gt;उनके नाम&lt;br /&gt;विनोबा भावे, बाबा आमटे&lt;br /&gt;और हाल ही की मेधा पाटकर&lt;br /&gt;हो सकते हैं&lt;br /&gt;इनके कामों के नतीजे&lt;br /&gt;बहुत उम्मीद नहीं जगाते&lt;br /&gt;इन नामों को सुनकर&lt;br /&gt;ऊर्जा का संचार नहीं होता&lt;br /&gt;इनका सामना&lt;br /&gt;काले-ऍंग्रेजों से है&lt;br /&gt;क्या यही वजह है कि&lt;br /&gt;इनकी सफलता संदिग्ध है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ओ पिता&lt;br /&gt;हमें माफ करना&lt;br /&gt;हमारी पशु-वृत्ति&lt;br /&gt;बारम्बार जाग उठती है&lt;br /&gt;और परिणाम में&lt;br /&gt;हमारे निर्णय&lt;br /&gt;शरीर-हित में होते हैं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;झूठे शब्द&lt;br /&gt;और खोखली बातें&lt;br /&gt;हो गई हैं हमारी&lt;br /&gt;पथ-प्रदर्शक&lt;br /&gt;खोटे सिक्कों का अब&lt;br /&gt;टकसाल पर कब्जा है&lt;br /&gt;हमारे संस्कार हैं मिलावटी&lt;br /&gt;और चोखे की चाह&lt;br /&gt;हमने त्याग दी है&lt;br /&gt;और शायद इसीलिए&lt;br /&gt;निराशा के विरल क्षणों में&lt;br /&gt;इंसान बेचता है ज़मीर&lt;br /&gt;जैसे मैं बेच आया हूँ&lt;br /&gt;सस्ते दाम&lt;br /&gt;ओ पिता हमें क्षमा करना.&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3760252429097979220-1180271410281047527?l=atmaramsharma.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://atmaramsharma.blogspot.com/feeds/1180271410281047527/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3760252429097979220&amp;postID=1180271410281047527' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3760252429097979220/posts/default/1180271410281047527'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3760252429097979220/posts/default/1180271410281047527'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://atmaramsharma.blogspot.com/2009/04/blog-post_25.html' title='ओ पिता हमें क्षमा करना'/><author><name>Atmaram Sharma</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11944064525865661094</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://bp0.blogger.com/_ws8fvUK17cA/SIFlbEXxXJI/AAAAAAAAABo/-M-oWunBkdA/S220/atm+01+copy.gif'/></author><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3760252429097979220.post-3263665466487993147</id><published>2009-04-20T06:09:00.000-07:00</published><updated>2009-04-20T06:15:39.418-07:00</updated><title type='text'>दोराहा</title><content type='html'>मूँग की बड़ी डालते समय&lt;br /&gt;उठा यह सवाल&lt;br /&gt;कि इसमें कद्दू डालें या लौकी&lt;br /&gt;वह थी अनजान&lt;br /&gt;मैं भी सिफर&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह पहेली बूझने&lt;br /&gt;उसने अपनी सास को फोन लगाया&lt;br /&gt;वहाँ से उत्तर पाया&lt;br /&gt;जो ठीक लगे डालो&lt;br /&gt;साथ ही कहा&lt;br /&gt;चलो अच्छा है&lt;br /&gt;घर-गृहस्थी में&lt;br /&gt;मन तो लगा तुम्हारा&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पहेली अबूझी रही आयी&lt;br /&gt;और मुँह बाये खड़ी रही&lt;br /&gt;अब उसने&lt;br /&gt;माँ को फोन लगाया&lt;br /&gt;वह बोली&lt;br /&gt;काहे परेशान होती हो&lt;br /&gt;बाजार दर्जनों तरह की&lt;br /&gt;बड़ियों से भरे हैं&lt;br /&gt;जो मर्जी आये उठा लाओ&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब वह दोराहे पर थी&lt;br /&gt;उलझन ने बस&lt;br /&gt;रूप बदल लिया था.&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3760252429097979220-3263665466487993147?l=atmaramsharma.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://atmaramsharma.blogspot.com/feeds/3263665466487993147/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3760252429097979220&amp;postID=3263665466487993147' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3760252429097979220/posts/default/3263665466487993147'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3760252429097979220/posts/default/3263665466487993147'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://atmaramsharma.blogspot.com/2009/04/blog-post.html' title='दोराहा'/><author><name>Atmaram Sharma</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11944064525865661094</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://bp0.blogger.com/_ws8fvUK17cA/SIFlbEXxXJI/AAAAAAAAABo/-M-oWunBkdA/S220/atm+01+copy.gif'/></author><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3760252429097979220.post-5301203267264054193</id><published>2009-03-03T04:48:00.000-08:00</published><updated>2009-03-03T04:50:27.964-08:00</updated><title type='text'>शव और शिव</title><content type='html'>&lt;span style="font-size:130%;"&gt;अवमानना (अपमान) वह ताप है जो आपके भीतर छुपे विकारों को उकसाता है -- वे खौलने लगते हैं और परीक्षा की घड़ी तो तब आती है जब वे बाहर बगरने को आतुर हो जाते हैं. मज़ा यह कि अधिकतम लोग इस खौलते लावे को बाहर उगल देते हैं और सारी ऊर्जा व्यर्थ बह जाती है. कुछ गिने-चुने समर्थ लोग इस खौल को कण्ठ में धारण कर लेते हैं -- ना निगलते हैं, ना उगलते हैं और तत्काल क्रांति घटती है शव होने की परिणति शिव होने की ओर चल पड़ती है.&lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3760252429097979220-5301203267264054193?l=atmaramsharma.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://atmaramsharma.blogspot.com/feeds/5301203267264054193/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3760252429097979220&amp;postID=5301203267264054193' title='5 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3760252429097979220/posts/default/5301203267264054193'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3760252429097979220/posts/default/5301203267264054193'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://atmaramsharma.blogspot.com/2009/03/blog-post.html' title='शव और शिव'/><author><name>Atmaram Sharma</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11944064525865661094</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://bp0.blogger.com/_ws8fvUK17cA/SIFlbEXxXJI/AAAAAAAAABo/-M-oWunBkdA/S220/atm+01+copy.gif'/></author><thr:total>5</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3760252429097979220.post-2553446894441185938</id><published>2009-01-18T08:01:00.000-08:00</published><updated>2009-01-18T08:08:06.605-08:00</updated><title type='text'>एकालाप</title><content type='html'>अभी तक ज़िंदा है&lt;br /&gt;शरीर के भीतर&lt;br /&gt;एक और शरीर&lt;br /&gt;जो रोकता है&lt;br /&gt;टोकता है&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कटु-वचन बोलकर&lt;br /&gt;भर उठता है&lt;br /&gt;ग्लानि से&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अपकर्म करके&lt;br /&gt;करता है&lt;br /&gt;पश्चाताप&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पर-दुख-कातरता&lt;br /&gt;अभी भी&lt;br /&gt;बची है शेष&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मेरे-तेरे भेद को&lt;br /&gt;नहीं मानता&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह ठीक है कि&lt;br /&gt;उसका जीवन&lt;br /&gt;बहुत कम शेष है&lt;br /&gt;लेकिन, निराश मत होओ मन&lt;br /&gt;क्योंकि&lt;br /&gt;मृत्यु-शैय्या पर&lt;br /&gt;पड़ा रोगी&lt;br /&gt;अभी मरा नहीं है&lt;br /&gt;और आशा की डोर&lt;br /&gt;अभी टूटी नहीं है&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3760252429097979220-2553446894441185938?l=atmaramsharma.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://atmaramsharma.blogspot.com/feeds/2553446894441185938/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3760252429097979220&amp;postID=2553446894441185938' title='5 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3760252429097979220/posts/default/2553446894441185938'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3760252429097979220/posts/default/2553446894441185938'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://atmaramsharma.blogspot.com/2009/01/blog-post.html' title='एकालाप'/><author><name>Atmaram Sharma</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11944064525865661094</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://bp0.blogger.com/_ws8fvUK17cA/SIFlbEXxXJI/AAAAAAAAABo/-M-oWunBkdA/S220/atm+01+copy.gif'/></author><thr:total>5</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3760252429097979220.post-7075767636923846760</id><published>2008-11-24T07:21:00.000-08:00</published><updated>2008-11-24T07:23:11.199-08:00</updated><title type='text'>प्रिया! घर आने वाली हैं...</title><content type='html'>मन से उठी पुकार&lt;br /&gt;प्रिया! घर आने वाली हैं...&lt;br /&gt;घर की थानेदार&lt;br /&gt;प्रिया! घर आने वाली हैं...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कागद-पत्तर करो व्यवस्थित&lt;br /&gt;तकिया चारपाई और बिस्तर&lt;br /&gt;तेल का पीपा धरो यथावत&lt;br /&gt;होओ होशियार&lt;br /&gt;प्रिया! घर आने वाली हैं...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;विदा करो ठलुओं को घर से&lt;br /&gt;बरतन-भांडे माँजो फिर से&lt;br /&gt;करो सफाई घर की ऐसी&lt;br /&gt;फैल जाए चमकार&lt;br /&gt;प्रिया! घर आने वाली हैं...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हाथ चूम लेंगी वे आकर&lt;br /&gt;लाड़ जताएँगी मुस्काकर&lt;br /&gt;मन के झाँझ-मजीरे बोलें&lt;br /&gt;खनकेगी खरतार&lt;br /&gt;प्रिया! घर आने वाली हैं...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कानी कौंड़ी साथ न जाना&lt;br /&gt;माया खातिर मन ललचाना&lt;br /&gt;मौत सौतियाडाह करेगी&lt;br /&gt;कर देगी बंटाढार&lt;br /&gt;प्रिया! घर आने वाली हैं...&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3760252429097979220-7075767636923846760?l=atmaramsharma.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://atmaramsharma.blogspot.com/feeds/7075767636923846760/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3760252429097979220&amp;postID=7075767636923846760' title='5 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3760252429097979220/posts/default/7075767636923846760'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3760252429097979220/posts/default/7075767636923846760'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://atmaramsharma.blogspot.com/2008/11/blog-post_24.html' title='प्रिया! घर आने वाली हैं...'/><author><name>Atmaram Sharma</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11944064525865661094</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://bp0.blogger.com/_ws8fvUK17cA/SIFlbEXxXJI/AAAAAAAAABo/-M-oWunBkdA/S220/atm+01+copy.gif'/></author><thr:total>5</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3760252429097979220.post-4653310499278167819</id><published>2008-11-12T07:23:00.000-08:00</published><updated>2008-11-12T07:24:56.046-08:00</updated><title type='text'>प्रिया! घर आयेंगी...</title><content type='html'>किये साज-श्रृंगार&lt;br /&gt;प्रिया! घर आयेंगी&lt;br /&gt;मन के खोले द्वार&lt;br /&gt;प्रिया! घर आयेंगी&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;हृदय-तंतु झनझना उठेंगे&lt;br /&gt;शहनाई की तान सुनेंगे&lt;br /&gt;रोम-रोम पुलकित होगा&lt;br /&gt;खनकेगा तन का तार&lt;br /&gt;प्रिया! घर आयेंगी...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मन मयूर नाचेगा उस क्षण&lt;br /&gt;देहरी लाँघ आओगी जिस क्षण&lt;br /&gt;भर आयेगा कंठ&lt;br /&gt;पुलक जाओगी बारम्बार&lt;br /&gt;प्रिया! घर आयेंगी...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नई-नकोर पायलिया पहने&lt;br /&gt;रुनक-झुनक चलने में खनके&lt;br /&gt;तुम्हें देखकर नयी पड़ोसन&lt;br /&gt;फेंकेगी चुमकार&lt;br /&gt;प्रिया! घर आयेंगी...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सखी-सहेली की कनबतियाँ&lt;br /&gt;याद आयेंगी मन की बतियाँ&lt;br /&gt;उभर आयेगी -&lt;br /&gt;अम्मा-बाबा की फिर-फिर पुचकार&lt;br /&gt;प्रिया! घर आयेंगी...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;देस पराये सबको जाना&lt;br /&gt;आपस्वार्थी मन बौराना&lt;br /&gt;मेरा-मेरा चीखे हरदम&lt;br /&gt;कर न पाए उपकार&lt;br /&gt;प्रिया! घर आयेंगी...&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3760252429097979220-4653310499278167819?l=atmaramsharma.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://atmaramsharma.blogspot.com/feeds/4653310499278167819/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3760252429097979220&amp;postID=4653310499278167819' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3760252429097979220/posts/default/4653310499278167819'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3760252429097979220/posts/default/4653310499278167819'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://atmaramsharma.blogspot.com/2008/11/blog-post_12.html' title='प्रिया! घर आयेंगी...'/><author><name>Atmaram Sharma</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11944064525865661094</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://bp0.blogger.com/_ws8fvUK17cA/SIFlbEXxXJI/AAAAAAAAABo/-M-oWunBkdA/S220/atm+01+copy.gif'/></author><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3760252429097979220.post-5590247525330848538</id><published>2008-11-06T06:44:00.000-08:00</published><updated>2008-11-06T06:47:57.247-08:00</updated><title type='text'>प्रिया तुम पास नहीं हो</title><content type='html'>फूल आई कचनार&lt;br /&gt;प्रिया तुम पास नहीं हो&lt;br /&gt;रातें हुईं पहार&lt;br /&gt;प्रिय तुम पास नहीं हो&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सूख गई मन की चिकनाई&lt;br /&gt;गुजरी रात भोर हो आई&lt;br /&gt;बिसर गई मनुहार&lt;br /&gt;प्रिया तुम पास नहीं हो&lt;br /&gt;लगते घर के कमरे खाली&lt;br /&gt;ज्यों शरबत की चटकी प्याली&lt;br /&gt;सूना सब संसार&lt;br /&gt;प्रिया तुम पास नहीं हो&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मेरा हाल हुआ है ऐसे&lt;br /&gt;बिना नमक की दाल हो जैसे&lt;br /&gt;घर में नहीं अचार&lt;br /&gt;प्रिया तुम पास नहीं हो&lt;br /&gt;मुँह उठाए फिरता हूँ ऐसे&lt;br /&gt;बिना धनी की भैंस हो जैसे&lt;br /&gt;पूंछ उठाए - खूंटा तोड़े भरती है हुंकार&lt;br /&gt;प्रिया तुम पास नहीं हो&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;खा-पीकर फिर मौज मनाई&lt;br /&gt;निंदा-रस की चाट उड़ाई&lt;br /&gt;अपनी खातिर माथा कूटा&lt;br /&gt;पर-स्वारथ को मैल न छूटा&lt;br /&gt;ज़िंदगानी दिन-रात खरचकर&lt;br /&gt;महिने की हुई पगार&lt;br /&gt;प्रिया तुम पास नहीं हो&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3760252429097979220-5590247525330848538?l=atmaramsharma.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://atmaramsharma.blogspot.com/feeds/5590247525330848538/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3760252429097979220&amp;postID=5590247525330848538' title='3 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3760252429097979220/posts/default/5590247525330848538'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3760252429097979220/posts/default/5590247525330848538'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://atmaramsharma.blogspot.com/2008/11/blog-post.html' title='प्रिया तुम पास नहीं हो'/><author><name>Atmaram Sharma</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11944064525865661094</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://bp0.blogger.com/_ws8fvUK17cA/SIFlbEXxXJI/AAAAAAAAABo/-M-oWunBkdA/S220/atm+01+copy.gif'/></author><thr:total>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3760252429097979220.post-2725040424774278829</id><published>2008-09-26T08:40:00.001-07:00</published><updated>2008-10-06T09:15:11.133-07:00</updated><title type='text'>अमीवा</title><content type='html'>सजता है उनका दरबार और उसमें होने को शामिल तरसते हैं सब. जैसे तरबूजे को देखकर तरबूजा बदलता है रंग, वैसे ही उनकी नज़रें-इनायतों की खातिर सभी लगे हैं अपना काया-कल्प करने में. वे कहते हैं हाँ तो सामूहिक स्वर हामी भरता है. उनकी ना को सभी अनुनासिक होकर स्वीकारते हैं. तिस पर मज़ा यह कि वे अपनी इस भेड़ियाधसान फौज को अच्छी तरह पहचानते हैं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कभी जब होते हैं वे नाखुश तो कुछ के चेहरे गमगीन और कुछ भीतर से आनंदित होते हैं. होती है किसी की तारीफ तो सभी डेढ़ इंच की मुस्कान लिये इसे प्रत्यक्ष-परोक्ष में अपनी हौसला अफजाई मानते हैं. दंत निपोरी की सभी धारायें प्राय: सभी को कंठस्थ हैं. पेंच की बातें वे अवसर जानकर और चासनी में लपेटकर प्रस्तुत करते हैं. मुँहदेखी पंचायत और ठकुर-सुहाती की परम्परा वहाँ अब बचपने से निकलकर यौवनावस्था को प्राप्त हो रही है.&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;वे कुछ बाँच रहे हैं, सभी उनके मुख को जाँच रहे हैं. उनके मुख से शब्द निकले नहीं कि बाकी उसे झेल लेते हैं. 'जी सर', 'ठीक है', 'अच्छी बात है', 'बेहतर है', 'हो जायेगा', 'देख लूँगा', 'मैं करता हूँ', 'करवाता हूँ' जैसे वाक्य वहाँ की दीवारों पर लिखे हुए हैं, जिन्हें सिर्फ बाकी के पढ़ पाते हैं. दरबारी पढ़ इसलिए पाते हैं, क्योंकि वे इन्हें सुनना चाहते हैं. 'ना न निकले' की ध्वनि वहाँ की हवा की शीतलता में घुलकर एकामेक हो गयी है और बाकियों पर उसका नींमअसर बराबर बना रहता है. 'हें-हें' का पहला दौर उपदेशात्मक होता है और बाकी वात्सल्यभाव से 'हें-हें' करते हैं. इस दौर का अंत चाय रूपी चरणामृत बंटन से होता है. जिन्हें चरणामृत मिला वे तृप्त और जिन्हें नहीं मिला वेर् ईष्या से लहालोट होते हैं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वे जब मज़े के मूड़ में होते हैं तो मर्जी को उजागर नहीं करते. बाकी के तब उनकी छाप-तिलक टटोलने लगते हैं. उनकी मर्जी अन्धों का हाथी हो जाया करती है और वे मज़े-से उसकी सवारी गाँठते हैं. उनके कक्ष की फिजा समतामूलक है और समानता का छल-छन्द वहाँ अपने आप महसूसने लगता है. उनके मुख से निकले वाक्य वहाँ का संविधान हो जाता है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;चायरूपी चरणामृत पीकर जब मैं वहाँ से निकला लगा अमीवा में बदल गया हूँ.&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3760252429097979220-2725040424774278829?l=atmaramsharma.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://atmaramsharma.blogspot.com/feeds/2725040424774278829/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3760252429097979220&amp;postID=2725040424774278829' title='3 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3760252429097979220/posts/default/2725040424774278829'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3760252429097979220/posts/default/2725040424774278829'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://atmaramsharma.blogspot.com/2008/09/blog-post_8147.html' title='अमीवा'/><author><name>Atmaram Sharma</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11944064525865661094</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://bp0.blogger.com/_ws8fvUK17cA/SIFlbEXxXJI/AAAAAAAAABo/-M-oWunBkdA/S220/atm+01+copy.gif'/></author><thr:total>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3760252429097979220.post-9153572705192016963</id><published>2008-09-26T08:40:00.000-07:00</published><updated>2008-09-26T08:42:22.640-07:00</updated><title type='text'>रुटीन</title><content type='html'>&lt;span style="font-size:130%;"&gt;हरेक अपने रुटीन का आदी होता है. यह बदलते ही छटपटाहट होती है. एक रुटीन के छूटते ही दूसरे को जमाने का प्रयास शुरू हो जाता है. लगातार एक जैसे काम नीरसता पैदा करते हैं और जोश में उन्हें बदलने की झोंक उठती है.&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;&lt;br /&gt;एक बार जंगल में जानवरों की सभा हुई. सभी ने तय किया कि स्वतंत्रता हमारा जन्मसिध्द अधिकार है सो हमारे भाईबंद जो आदमियों द्वारा बंधक बनाये या पाले गए हैं, उन्हें छुड़ाना चाहिए. क्राँति के सूत्रपात के तहत एक-एक करके सभी पालतू जानवरों को छुड़ाने का उपक्रम आरंभ हुआ. अंत में तेली के यहाँ कोल्हू के बैल के पास पहुँचे और उसे स्वतंत्रता के गीत सुनाये गए. कहा गया कि स्वतंत्रता हर जीव का जन्मसिध्द अधिकार है. बैल औंचक देखता रहा और बोला- इससे क्या फायदा होगा? सब बोले- तुम आजाद हो जाओगे. अपनी मर्जी से घूम फिर सकोगे और अपनी मर्जी से खा-पी सकोगे. बैल को बात कुछ समझ नहीं आई, लेकिन सभी का आग्रह था सो वह भी स्वतंत्र होकर जंगल में पहुँच गया. यहाँ उसके साथ सब कुछ नया और रोमांचक था. चारों ओर हरी-भरी घास थी. पीने को झरनों का स्वच्छ पानी था. आराम करने को पेड़ों की छाँव थी. खाओ-पिओ और आराम करो. उसने भरपेट खाया और आराम करते खाए हुए को पगुराया. एक झपकी भी ली.&lt;br /&gt;और इस तरह कई दिन गुजर गए. खा लिए, पी लिए और मौज उड़ा ली, लेकिन जल्दी ही लीक पर चलने का सनातन अभ्यास जोर मारने लगा और बिना काम के वह बोर होने लगा. अब क्या करूँ नामक सवाल उसके दिमाग में बार-बार खड़ा हो रहा था. जंगल में बैल को करने लायक कुछ था भी नहीं. ज्यों-ज्यों वह दिमाग पर जोर डाले उसकी बेचैनी बढ़ने लगती. वह सोचने लगा और निष्कर्ष निकाला कि स्वतंत्रता का क्या यही मतलब है. अगर यह ऐसी ही है तो यह बड़ी कठिन है. खा-पीकर आराम करो और करने को कुछ नहीं. कितने दिनों तक यह सब चलता रहेगा. बैल से यह नयी स्वतंत्रता हजम नहीं हुई और वह बेचैनी में पड़ गया और अंतत: एक दिन सुबह तेली के दरवाजे पर खड़ा हो गया.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तेली ने बैल को देखा तो बोला- क्यों भई, क्या हुआ तुम्हारी स्वतंत्रता का. बैल मुँह लटकाए रहा और कोल्हू के पास जाकर खड़ा हो गया. तेली ने उसे फिर छेड़ा- बोलो भाई अपनी स्वतंत्रता के बारे में. बैल मरी आवाज में बोला- खाया-पिया और आराम किया. पर वहाँ करने को कुछ था नहीं सो ऐसी स्वतंत्रता किस काम की. मुझे बड़ी बेचैनी हो रही थी. लगा इससे अच्छा तो अपना पुराना काम ही था. खाने-पीने को कम मिलता था. डाँट अलग पड़ती थी, लेकिन रोजनदारी का काम तय था. दिमाग पर कोई जोर नहीं डालना पड़ता था. वहाँ तो दिमाग पर भारी जोर डाला पर करने लायक कुछ सूझा ही नहीं सो वापस आ गया.&lt;br /&gt; &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3760252429097979220-9153572705192016963?l=atmaramsharma.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://atmaramsharma.blogspot.com/feeds/9153572705192016963/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3760252429097979220&amp;postID=9153572705192016963' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3760252429097979220/posts/default/9153572705192016963'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3760252429097979220/posts/default/9153572705192016963'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://atmaramsharma.blogspot.com/2008/09/blog-post_26.html' title='रुटीन'/><author><name>Atmaram Sharma</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11944064525865661094</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://bp0.blogger.com/_ws8fvUK17cA/SIFlbEXxXJI/AAAAAAAAABo/-M-oWunBkdA/S220/atm+01+copy.gif'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3760252429097979220.post-8769615736905978617</id><published>2008-09-21T09:02:00.000-07:00</published><updated>2008-09-21T09:05:15.776-07:00</updated><title type='text'>बड़ा आदमी : एक खुशफहमी</title><content type='html'>&lt;span style="font-size:130%;"&gt;प्रसिध्द फिल्मी डॉयलाग है- 'एक दिन में बड़ा आदमी बनूँगा'. जबकि असल ज़िंदगी में बहुत कम लोग इसे इस तरह और इन शब्दों में कहते हैं. यही कारण है कि अधिसंख्य लोग आम आदमी हैं. हालाँकि आम आदमी होना कोई बुराई नहीं है और ना ही बड़ा आदमी बनना कोई महान उपलब्धि. यह सिर्फ नजरिए का फर्क है जो इंसान को छोटा या बड़ा बनाता है. आप बदतर स्थितियों में बड़प्पन दिखा सकते हैं, जबकि सुख-सुविधा सम्पन्न वर्ग ओछी हरकतों के लिए कुख्यात हैं. बड़े आदमी होने की घटना बाहरी नहीं आंतरिक है. जैसे ही आप इस सपने को स्वीकार करते हैं - एक क्रांति-सी हो जाती है. चीजों के प्रति आपका नजरिया बदलने लगता है. समय का हरेक पल आपको कीमती महसूस होने लगता है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अक्सर बड़ा आदमी होने से आशय आर्थिक तौर पर सुदृढ़ स्थिति वाले आदमी के तौर पर समझा जाता है. पद, पैसा और नाम वाले आदमी को भी बड़ा आदमी कहा जाता है. बड़े आदमी की यह बाहरी छवि है और प्राय: हरेक इसे हासिल करने के बारे में एक न एक बार सोचता जरूर है. आखिर सुख-सुविधाएं किसे बुरी लगती हैं. हरेक चाहता है - बंगला हो, गाड़ी हो, अर्दली हों, खरचने को पैसा हो, चार लोगों में नाम हो, अच्छे मददगार हों, सुंदर कपड़े हों. बड़े आदमी का बाहरी स्वरूप हरेक पाना चाहता है. कितने पा पाते हैं या पाने की दिशा में सोचकर रुक जाते हैं, यह दूसरी बात है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;स्थिर और जड़ समाज में यही बड़ी घटना समझी जाएगी कि लोग बड़े आदमी बनने की दिशा में सोचते तो हैं. सोचा हुआ ही किसी दिन व्यवहार में बदल जाता है. इच्छाशक्ति दृढ़ता प्रदान करती है. लगन भी उसी से उपजती है. जब एक बार किसी चीज की लगन लग जाती है तो उसे आदमी पाकर ही दम लेता है. इस हिसाब से बड़ा आदमी बनना बड़ा आसान काम है. सिर्फ लगन लगाने की जरूरत है और लगन बेचारी आसानी से लगती नहीं. अगर वह लग गई तो कभी न कभी इंसान बड़ा आदमी बन ही जाएगा. लगन ही उसे रास्ता सुझाएगी और वही रास्तों के काँटों को झेलने की ताकत भी पैदा करेगी. तब हँसते-हँसते इंसान सब मुश्किलों को स्वीकार करता जाता है और अंत में बड़ा आदमी बन जाता है.&lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3760252429097979220-8769615736905978617?l=atmaramsharma.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://atmaramsharma.blogspot.com/feeds/8769615736905978617/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3760252429097979220&amp;postID=8769615736905978617' title='3 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3760252429097979220/posts/default/8769615736905978617'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3760252429097979220/posts/default/8769615736905978617'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://atmaramsharma.blogspot.com/2008/09/blog-post_21.html' title='बड़ा आदमी : एक खुशफहमी'/><author><name>Atmaram Sharma</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11944064525865661094</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://bp0.blogger.com/_ws8fvUK17cA/SIFlbEXxXJI/AAAAAAAAABo/-M-oWunBkdA/S220/atm+01+copy.gif'/></author><thr:total>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3760252429097979220.post-3716206158361747558</id><published>2008-09-15T04:31:00.000-07:00</published><updated>2008-09-15T04:32:04.458-07:00</updated><title type='text'>सनातन भाष्य</title><content type='html'>ओ वाक्&lt;br /&gt;दुनियावी सच और&lt;br /&gt;इंसानी फितरतों की&lt;br /&gt;साक्षी हो तुम.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मर्मांतक सच है यह&lt;br /&gt;शरीर का तुम&lt;br /&gt;आधा हिस्सा हो &lt;br /&gt;प्रेरणा देती हो&lt;br /&gt;पौरुष जागता है&lt;br /&gt;तुम्हारे ही दर्प से&lt;br /&gt;हिंस्र-पशु का उफनता है अहंकार&lt;br /&gt;और अंतत: मिट्टी में मिलता है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ओ देवी!&lt;br /&gt;प्रलय का कापालिक&lt;br /&gt;क्योंकर जगाती हो&lt;br /&gt;अबूझ है यह पहेली&lt;br /&gt;परत-दर-परत का मर्म&lt;br /&gt;भीषण-घृणा और&lt;br /&gt;पतंगे-सी प्रीति&lt;br /&gt;क्योंकर महसूसता है&lt;br /&gt;आधा शरीर.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भावनाओं का आवेग&lt;br /&gt;हर बार तुम्हें रौंदता है &lt;br /&gt;कभी प्यार-पगे शब्दों से &lt;br /&gt;तो कभी कायान्तरण करके.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;चंद्रमा की गतियों की मानिंद&lt;br /&gt;बदलती है तुम्हारी धज &lt;br /&gt;रात के सन्नाटे में और &lt;br /&gt;ऍंधेरे में &lt;br /&gt;दायें हाथ को बायाँ&lt;br /&gt;अजनबी क्यों लगता है &lt;br /&gt;स्तम्भन की कमतरी &lt;br /&gt;पहले दिमाग में उतरती है &lt;br /&gt;और आखिर में &lt;br /&gt;नसों पर थिर &lt;br /&gt;हो जाती है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तुम बिफरती हो &lt;br /&gt;करती हो घृणा &lt;br /&gt;पर सावधान इतनी कि &lt;br /&gt;उजागर नहीं होता कुछ &lt;br /&gt;जैसे वमन की जुगुप्सा &lt;br /&gt;किसी को भी &lt;br /&gt;विचलित कर सकती है &lt;br /&gt;ठीक वैसे ही तुम &lt;br /&gt;भीतर से विचलित होती हो.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तुम अमरबेल-सी &lt;br /&gt;रोज-रोज बढ़ती हो &lt;br /&gt;और &lt;br /&gt;छा जाती हो &lt;br /&gt;वामन-विराट पर &lt;br /&gt;कभी न कभी &lt;br /&gt;तुम्हारी सर्वभच्क्ष इच्छा &lt;br /&gt;प्रकट हो ही जाती है &lt;br /&gt;और प्रकृति के प्रकोप &lt;br /&gt;की माफिक &lt;br /&gt;हिला देती हो &lt;br /&gt;अवलम्बन को.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;चराचर जगत की &lt;br /&gt;स्वामिनी तुम &lt;br /&gt;समर्पण करके ही &lt;br /&gt;जीतता है पुरुष &lt;br /&gt;पीता है मधु&lt;br /&gt;चखता है मद&lt;br /&gt;और पुन:&lt;br /&gt;सृजन का चक्र &lt;br /&gt;अवस्थित होता है &lt;br /&gt;मूलाधार में.&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3760252429097979220-3716206158361747558?l=atmaramsharma.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://atmaramsharma.blogspot.com/feeds/3716206158361747558/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3760252429097979220&amp;postID=3716206158361747558' title='3 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3760252429097979220/posts/default/3716206158361747558'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3760252429097979220/posts/default/3716206158361747558'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://atmaramsharma.blogspot.com/2008/09/blog-post_15.html' title='सनातन भाष्य'/><author><name>Atmaram Sharma</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11944064525865661094</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://bp0.blogger.com/_ws8fvUK17cA/SIFlbEXxXJI/AAAAAAAAABo/-M-oWunBkdA/S220/atm+01+copy.gif'/></author><thr:total>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3760252429097979220.post-7664747445338077370</id><published>2008-09-11T00:42:00.000-07:00</published><updated>2008-09-11T00:43:32.623-07:00</updated><title type='text'>एक परीक्षा</title><content type='html'>वे जब कर रहे थे&lt;br /&gt;तैयारी&lt;br /&gt;एक परीक्षा देने की&lt;br /&gt;सैकड़ों अनजान थे &lt;br /&gt;ऐसी किसी परीक्षा की बाबत&lt;br /&gt;जो बदल देती है&lt;br /&gt;नज़रिया ज़िंदगी का.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ऑंखें तो वे ही होतीं&lt;br /&gt;पर दृश्य के मायने&lt;br /&gt;बदल जाते हैं&lt;br /&gt;कान तो वैसे ही&lt;br /&gt;सुनते हैं&lt;br /&gt;पर अहसास&lt;br /&gt;जुदा होता है&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इक तंग घेरे से&lt;br /&gt;बड़े घेरे में&lt;br /&gt;धकेल देती है&lt;br /&gt;एक परीक्षा&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उनका उठना-बैठना&lt;br /&gt;बोल-बरताव&lt;br /&gt;क्या-कुछ नहीं&lt;br /&gt;बदल जाता&lt;br /&gt;ऑंखोंभर दृश्य&lt;br /&gt;और&lt;br /&gt;कानोंभर शब्द&lt;br /&gt;अलहदा असर करते हैं&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वे हो जाते हैं खास&lt;br /&gt;और बाकी&lt;br /&gt;आम रह जाते हैं.&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3760252429097979220-7664747445338077370?l=atmaramsharma.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://atmaramsharma.blogspot.com/feeds/7664747445338077370/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3760252429097979220&amp;postID=7664747445338077370' title='4 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3760252429097979220/posts/default/7664747445338077370'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3760252429097979220/posts/default/7664747445338077370'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://atmaramsharma.blogspot.com/2008/09/blog-post_11.html' title='एक परीक्षा'/><author><name>Atmaram Sharma</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11944064525865661094</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://bp0.blogger.com/_ws8fvUK17cA/SIFlbEXxXJI/AAAAAAAAABo/-M-oWunBkdA/S220/atm+01+copy.gif'/></author><thr:total>4</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3760252429097979220.post-4069787617685581164</id><published>2008-09-03T23:14:00.000-07:00</published><updated>2008-09-03T23:17:48.845-07:00</updated><title type='text'>नये जमाने की लड़की</title><content type='html'>पनीली ऑंखों में&lt;br /&gt;गुजरा जमाना &lt;br /&gt;अब भी कायम है&lt;br /&gt;कुछ भूमिकाएँ भर बदलीं हैं&lt;br /&gt;बाकी दुनिया यथावत है&lt;br /&gt;पहले उसकी जरूरतें&lt;br /&gt;कोई और पूरी करता था&lt;br /&gt;अब कोई और करता है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कीमत की उसे नहीं फिकर&lt;br /&gt;कमतरी से है नफरत&lt;br /&gt;नायाब से नायाबपना&lt;br /&gt;उसे हमेशा ललचाता है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक दिन उसने पूछा--&lt;br /&gt;पत्तियों के पीलेपन और&lt;br /&gt;बालों के क्लिप के नीलेपन में&lt;br /&gt;क्या संबंध हो सकता है&lt;br /&gt;मैं नहीं समझ पाता&lt;br /&gt;क्या बोलूँ.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हमने कहा--&lt;br /&gt;तुम रूठ तो जाओ ज़रा&lt;br /&gt;बला टले&lt;br /&gt;मगर वह नहीं रूठी और टली भी नहीं&lt;br /&gt;बोली-&lt;br /&gt;उसे तो चाँद चाहिए&lt;br /&gt;कहीं से भी लाकर दो &lt;br /&gt;कैसे भी खरीदकर लाओ&lt;br /&gt;किसी भी कीमत पर&lt;br /&gt;कुछ न बचा हो तो&lt;br /&gt;खुद को बेच आओ&lt;br /&gt;मगर&lt;br /&gt;चाँद लाओ.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैंने पूछा--&lt;br /&gt;मेरे बगैर करोगी क्या चाँद का&lt;br /&gt;उसने कहा--&lt;br /&gt;पहले लाओ तो&lt;br /&gt;बाद में सोचेंगे.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वह पगली&lt;br /&gt;नहीं जानती&lt;br /&gt;इंसान का मैं-पना ही&lt;br /&gt;उसकी ताकत है&lt;br /&gt;जब वही झर जायेगा&lt;br /&gt;चीज़ों के मायने बदल जायेंगे.&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3760252429097979220-4069787617685581164?l=atmaramsharma.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://atmaramsharma.blogspot.com/feeds/4069787617685581164/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3760252429097979220&amp;postID=4069787617685581164' title='6 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3760252429097979220/posts/default/4069787617685581164'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3760252429097979220/posts/default/4069787617685581164'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://atmaramsharma.blogspot.com/2008/09/blog-post.html' title='नये जमाने की लड़की'/><author><name>Atmaram Sharma</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11944064525865661094</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://bp0.blogger.com/_ws8fvUK17cA/SIFlbEXxXJI/AAAAAAAAABo/-M-oWunBkdA/S220/atm+01+copy.gif'/></author><thr:total>6</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3760252429097979220.post-1078659941399148403</id><published>2008-08-20T20:29:00.000-07:00</published><updated>2008-08-20T20:31:40.801-07:00</updated><title type='text'>दो पहलू</title><content type='html'>&lt;span style="font-size:130%;"&gt;घर पहुँचते ही उसकी&lt;br /&gt;शुरू होती है - राम कहानी&lt;br /&gt;वही-वही बातें - वे ही दिक्कतें&lt;br /&gt;आखिर एक जैसे शब्द सुनकर&lt;br /&gt;कान भी तो पक ही जाते हैं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पूछा मैंने- आज क्या हुआ?&lt;br /&gt;बोली वह- कोहनी में दर्द है&lt;br /&gt;सुनता हूँ और 'हूँ' भर कहता हूँ&lt;br /&gt;मन उसके मर्ज गिनता है&lt;br /&gt;कि गिनती दहाई तक पहुँच गई&lt;br /&gt;और मर्ज खत्म नहीं होते.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;करती है वह सवाल&lt;br /&gt;बोलती है वह - सुनता हूँ मैं&lt;br /&gt;दुनिया के सारे मर्ज&lt;br /&gt;मुझे ही क्यों हैं?&lt;br /&gt;मैं क्या जबाव दूँ&lt;br /&gt;गिनवाती है वह तकलीफें&lt;br /&gt;कमर में दर्द है&lt;br /&gt;माथे में पीड़ा है&lt;br /&gt;कंधों में टीस है&lt;br /&gt;चेहरे पर झाइयाँ हैं&lt;br /&gt;ऑंखों के नीचे काले गड्ढ़े हैं&lt;br /&gt;बाल झड़ रहे हैं&lt;br /&gt;देर तक सुनता हूँ मैं&lt;br /&gt;कहता हूँ- ह्यूमोग्लोबिन कम हो रहा है&lt;br /&gt;खाली नज़रों से देखती है वह मेरा चेहरा&lt;br /&gt;बस!&lt;br /&gt;इतनी लम्बी गिनती का&lt;br /&gt;इतना-सा उत्तर.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वह बात बदलती है&lt;br /&gt;कहती है-&lt;br /&gt;पड़ौसन छरहरी हो रही है&lt;br /&gt;इन दिनों&lt;br /&gt;पता नहीं क्या खाती है&lt;br /&gt;गाँव की गँवार&lt;br /&gt;शहर की मेम&lt;br /&gt;हुई जा रही है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कहना चाहता हूँ&lt;br /&gt;पर कहता नहीं&lt;br /&gt;कि पड़ौसन&lt;br /&gt;अपने में खोई रहती है&lt;br /&gt;बच्चे उसके खेलते हैं&lt;br /&gt;घर में किटी-पार्टी है&lt;br /&gt;बच्चा बीमार है&lt;br /&gt;वह पड़ौस में बैठी है&lt;br /&gt;बच्चे का होम-वर्क नहीं हुआ&lt;br /&gt;वह फेसियल कर रही है&lt;br /&gt;बच्चा भूखा सो गया&lt;br /&gt;वह नेल पॉलिस लगा रही है&lt;br /&gt;पति बासे ब्रेड खा रहा है&lt;br /&gt;वह फोन पर बतिया रही है&lt;br /&gt;किससे? - पता नहीं&lt;br /&gt;और इस तरह&lt;br /&gt;वह खिली-खिली रहती है&lt;br /&gt;और तुम&lt;br /&gt;अपने को खरच रही हो&lt;br /&gt;आहिस्ता-आहिस्ता&lt;br /&gt;बच्चों पर&lt;br /&gt;पति पर&lt;br /&gt;घर-परिवार पर&lt;br /&gt;सफाई पर&lt;br /&gt;साज-सम्हाल पर&lt;br /&gt;रिश्तेदारों पर&lt;br /&gt;और उस पर&lt;br /&gt;जो नहीं है हाथ में&lt;br /&gt;और जो हाथ में है&lt;br /&gt;वह खास नहीं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कल जो आने वाला है&lt;br /&gt;खो जाती हो उसमें&lt;br /&gt;आज जो गुजर रहा है&lt;br /&gt;वह ओझल है नज़रों से&lt;br /&gt;मैं क्या कहूँ - बोलूँ?&lt;br /&gt;सो 'हूँ' कहकर&lt;br /&gt;चुप हो जाता हूँ.&lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3760252429097979220-1078659941399148403?l=atmaramsharma.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://atmaramsharma.blogspot.com/feeds/1078659941399148403/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3760252429097979220&amp;postID=1078659941399148403' title='6 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3760252429097979220/posts/default/1078659941399148403'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3760252429097979220/posts/default/1078659941399148403'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://atmaramsharma.blogspot.com/2008/08/blog-post.html' title='दो पहलू'/><author><name>Atmaram Sharma</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11944064525865661094</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://bp0.blogger.com/_ws8fvUK17cA/SIFlbEXxXJI/AAAAAAAAABo/-M-oWunBkdA/S220/atm+01+copy.gif'/></author><thr:total>6</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3760252429097979220.post-6010423314797547108</id><published>2008-07-28T04:23:00.000-07:00</published><updated>2008-07-28T04:25:15.276-07:00</updated><title type='text'>प्यार की खातिर</title><content type='html'>गुजर गए दिन&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;राजा और रंक में जो भेद होता है, वही उसमें और मुझमें था। मैं सपने देखता था और जाहिर है कि सपने देखने पर कोई पाबंदी न उस समय थी, न आज है। उसका भाई मेरा दोस्त था। दसियों बार मैंने उसके भाई से अपनी मन की बात कही थी। कहा था कि चार पैसे कमाने की लियाकत अगर मैंने पायी तो तुम्हारी बहन का हाथ मागूंगा, तब तुम मना नहीं करना। उसने कहा एीक है पहले कुछ बन तो जाओ। समय बदला और मेरी रोजी-रोटी की जुगाड़ जम गयी। मैंने उसके भाई को उसका वादा याद दिलाया। भाई ने पहले हां की, फिर अगले ही दिन बदल गया। मेरे दिल पर चोट लगी। मैंने बहुत चिरौरी की। कहा की ऐसा न करो। यह जो मैं आज हूं वह तुम्हारी बहन के प्रेम में पड़कर ही बना हूं। मेरी पूरी उपलब्धि तुम्हारी बहन की अमानत है। अगर तुम्हारी बहन मुझे स्वीकार नहीं करती तो मैं इस उपलब्धि को लिये-लिये कहां फिरूंगा। जैसा कि जालिम जमाना करता है, वही उसके भाई ने किया। वह नहीं माना और अपने वादे से मुकर गया। मैं रोया, मेरा दिल रोया और वक्त ने घाव भरने शुरू कर दिये।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वक्त की करवट&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इतने लम्बे अरसे के बाद आज उसका फोन आया। वह मुझसे मिलना चाहता था। मैंने कहा किसलिये। वह बोला कुछ बात करना चाहता हूं। मैंने कहा आ जाओ। हमने मिलकर बातें की। बैएकर दारू पी। मुझे उसको दारू पिलाना अच्छा लग रहा था। अच्छा इसलिए क्योंकि वह परेशान था। फटेहाल था। बेरोजगार था। उसकी बातों में उसका पुराना दम्भ गलकर बह रहा था। मैंने उसे और दारू पिलायी। वह रोने लगा। बोला तुम मेरे लिये कुछ करो। हजार-दो हजार की नौकरी की जुगाड़ ही करा दो। उसकी आंखों में तैरती बेचारगी देखकर मुझे भीतर तक संतोष हुआ। मैंने कहा कि देखो यार तुम्हारी बहन के लिए अब भी मेरे दिल में कोमल भावनाएँ हैं। उन भावनाओं को आज मैं किस रूप में देखूं यह स्पष्ट नहीं है। क्योंकि वह भी शादीशुदा है और मेरा भी परिवार है। उन्हीं पुरानी मीएी भावनाओं को ध्यान में रख मैं तुम्हारे लिये जो बन पड़ेगा वह करूंगा। मेरा इतना कहना था कि वह लगभग रोते हुए मुझसे लिपटने लगा और बोला कि बिलकुल एीक कहते हो। मैं यही सोचकर तुम्हारे पास आया था कि तुम्ही मेरी बहन से सच्चा प्यार करते थे। उस सच्चे प्यार की खातिर मेरी मदद तुम जरूर ही करोगे और देखो मेरा सोचना कितना एीक निकला। आखिर तुम मेरी मदद करने के लिए मान ही गये। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;देना पड़ेगा&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;स्टेशन पर उसे छोड़कर मैं वापस लौटा। मन में उसके लिए गालियां उमड़ रही हैं। स्वार्थी, कमीना। दूसरे क्षण उसकी बहन का कोमल चेहरा मेरी आंखों में उतर आया है। आज मेरी जो भी औकात है, वह उसके बाप के सामने प्रस्तुत करने के लिए ही मैंने कमाई थी। औकात की इस कमाई को मैं उसके सामने तो प्रस्तुत नहीं कर सका, लेकिन इस कमीने को मैं अपने व्यक्तित्व की एक फूटी कौड़ी भी देने को तैयार नहीं हूं। मेरी आंखों में उसकी बहन के कोमल चेहरे में याचना उभरती है। गाली देती हुई मेरी जीभ लड़खड़ाने लगती है। मैं कमजोर पड़ने लगता हूं। वह व्यक्तित्व जो मैंने उसकी बहन के लिए कमाया था, उसका भाई उसमें से कुछ हिस्सा मांगने आया था। शायद मुझे कुछ भुगतान करना पड़ेगा। मेरे दिल की कोमल भावनाओं के खातिर शायद मुझे उसकी कुछ मदद करनी पड़ेगी।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3760252429097979220-6010423314797547108?l=atmaramsharma.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://atmaramsharma.blogspot.com/feeds/6010423314797547108/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3760252429097979220&amp;postID=6010423314797547108' title='8 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3760252429097979220/posts/default/6010423314797547108'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3760252429097979220/posts/default/6010423314797547108'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://atmaramsharma.blogspot.com/2008/07/blog-post_28.html' title='प्यार की खातिर'/><author><name>Atmaram Sharma</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11944064525865661094</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://bp0.blogger.com/_ws8fvUK17cA/SIFlbEXxXJI/AAAAAAAAABo/-M-oWunBkdA/S220/atm+01+copy.gif'/></author><thr:total>8</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3760252429097979220.post-392898479102233405</id><published>2008-07-21T23:41:00.000-07:00</published><updated>2008-07-21T23:43:56.347-07:00</updated><title type='text'>बढ़ती उमर और बचपन की यादें</title><content type='html'>उमर बढ़ने के साथ बचपने की स्मृतियाँ मोहक, सपने-जैसी और अच्छी लगने लगतीं हैं. बचपन तो दोबारा लौटता नहीं लिहाजा उन स्मृतियों को आदमी खुली ऑंखों के सपने के तौर पर देखता है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;खाँच, नदी, महुए और भाई&lt;br /&gt;खाँच (खेत) की बिरोल के एक तरफ हम चारों भाई गङ्ढे खोद रहे हैं. मैं सबसे बड़ा हूँ. सबसे छोटा मुझसे दस साल छोटा है. वह हमें काम करते देख रहा है, बल्कि निगरानी कर रहा है कि काम अच्छे-से हो रहा है या नहीं. बिरोल के दोनों तरफ पौधे रोपे जायेंगे, इसलिए हम गङ्ढे खोद रहे हैं. पौधे रोप कर हम प्रकृति का ऋण चुका सकते हैं, इसलिए हरेक इंसान को जीवन में कम से कम एक पौधा रोपना चाहिए, ऐसा पिताजी का कहना था. पिताजी के इस कहे को हमें मानना ही था. हमने ज्यों ही उसे माना, यह बात सच लगने लगी. गङ्ढे खोदते हुए पौधों का पेड़ बनना हम महसूस कर रहे थे. बच्चे होने के बड़े फायदे हैं. आप शुरूआत करते हुए उसका मध्य और अन्त आराम से महसूस कर सकते हैं. &lt;br /&gt;कुएँ पर रखा बिजली का पम्प तेजी से चल रहा है. बिरोल में पानी का बहाव इतना तेज़ है कि वह दोनों तरफ उबल रहा है. सुबह का सूरज अभी थोड़ी ऊँचाई पर ही पहुँचा है. खेतों में आधा हाथ खड़ी फसल पर ओंस की बूँदें साफ चमक रही हैं. हल्की धुँध की परत खेतों पर सफेद चादर-सी बिछी दिखती है. हवा की नमी शरीर में फुरफुरी पैदा कर रही है, लेकिन हमारे शरीर पर केवल लंगोट कसे हुए हैं. तेल मालिश के कारण हमारे शरीर चमक रहे हैं. गङ्ढों से मिट्टी निकालने के कारण हमारे माथों पर पसीना छलक आया है. कुदाली से हम खोदते हैं और फावड़े से मिट्टी को गङ्ढे के चारों तरफ फैलाते जाते हैं. &lt;br /&gt;काम करते हुए हमारी ऑंखों में परिणाम के सपने तैर रहे हैं और इस वज़ह से हमारी गति सामान्य से ज्यादा है. हम जैसे उमंग की लहर पर सवार हैं. हम अभी गङ्ढे ही खोद रहे हैं, लेकिन हमें महसूस होता है कि इन गङ्ढों में बड़े और हरे-भरे पेड़ खड़े हैं. इन पेड़ों की घनी छाया हमें गरमाहट का अहसास कराती है, मानो शीत-लहर से पेड़ हमारी रक्षा कर रहे हैं. एीक वैसे ही जैसे तपती धूप में पेड़ों की छाया हमें एण्डक देती है. हम अभी बच्चे ही हैं. जल्दी ही जोश में आ जाते हैं. शरीर हमारे ज़रूर छोटे हैं, लेकिन जैसे ऑंखों में पूरा आसमान समा जाता है वैसे ही हमारे कोमल मन में भविष्य की इन्द्रधनुषी कल्पनाएँ आकार लेने लगती हैं.&lt;br /&gt;हमें अपने खेतों से मोह है. खेत के बगल में बहने वाली छोटी-सी नदी हमें प्यारी और रिश्तेदारी महसूस करवाती है. खाँच के महुए के पेड़ हमें गए-गुजरे बुजुर्गों जैसे लगते हैं.  महुए के पेड़ों के नामों तक में प्यार छुपा है- मिएवा, गुल्ला, टेड़ा. हमने सालों महुए चखे और बीने हैं, गुलेंदे बीने हैं और उनसे निकली गुली से कंचों वाला खेल खेला है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पाठशाला और हमारे हीरो हमारे पिता &lt;br /&gt;पाठशाला (एक और खेत) के पुराने, घने आम पर चढ़कर हम सभी मानो पक्षियों में बदल जाते हैं. आम की ऊँची डालों पर चढ़कर हम, यह कदम्ब का पेड़ अगर माँ की कल्पना करने लगते. आम की नीची डालों पर छुपन-छुपा खेलते घण्टों गुजार देते. बेरियों के बेर बीनते हुए आपस में संस्कृत के श्लोकों को दोहराते. बेरियों के नाम हमने उनकी मिठास, खटास और तीखेपन के हिसाब से रखे हुए थे.&lt;br /&gt;पाठशाला पर अमरूद के गिने-चुने दो पेड़ थे. एक था सफेदा, जिसका गूदा सफेद और बेहद मीठा होता था. इस पेड़ में हर साल फल नहीं लगते थे. लेकिन जब भी लगते टूट कर लगते. दूसरा अमरूद का पेड़ सदाबहार था. सदाबहार इन अर्थों में कि उसमें तकरीबन साल भर छोटे-बड़े अमरूद लगे दिखायी देते रहते थे. यह औसत दर्जे का अमरूद था. पाएशाला पर एक नींबू का झाड़ भी था. रहट वाले कुएँ के पास. इस झाड़ के नींबू शायद ही हमारे हाथ कभी आए हों.&lt;br /&gt;पाठशाला पर एक छोटा मगर कलमी आम का नया-नया पेड़ था. हमारे दिनों में यह गुल्ला कहलाता था. इसमें फल आना अभी शुरू नहीं हुए थे. आम के इस पौधे को लगाने का दावा दो लोग करते थे. दावा एोंकने वाला एक तो दाऊ था. दूसरे सीताराम भाई साहब भी यह कहते सुने गए कि गुल्ला उन्होंने लगाया है.&lt;br /&gt;पाठशाला में सागौन के पेड़ों का छोटा-सा बारोंदा था. एक बार हमारे पिता ने सागौन के इन पेड़ों को गिनकर, उन पर नम्बर डालने का काम मुझे सौंपा था. नम्बर तो खैर मैं नहीं डाल पाया लेकिन इन पेड़ों की गिनती मैंने जरूर की थी. छोटे-बड़े कुल मिलाकर यह तीस से चालीस पेड़ थे.&lt;br /&gt;पाठशाला तब हमारी थी. हमारी यानी हम सब की. हम सब की माने हमारे दादाजी की, जिन्होंने इसे बनाया. हमारे पिताजी सहित उनके तीनों भाईयों की. हमारे ताऊ-चाचा के लड़कों और हम चारों भाईयों की. ऐसी हमारी पाएशाला में एक तेंदू का पेड़ भी था जो बहुत ऊँचा और बहुत कम फल देने वाला था, लेकिन उसके फल बहुत मीठे थे.&lt;br /&gt;पाठशाला में अंग्रेजी इमली के भी दो-चार पेड़ थे. हमें नहीं पता कि उनको किस ने लगाया. अलबत्ता सीताफल के ढेरों पेड़ पाठशाला में यहां-वहां मौजूद थे. पाएशाल में पीपल के दो बड़े पेड़ और नीम के दर्जनों पेड़ मौजूद थे. &lt;br /&gt;असल में हमारे पिता पेड़ों को बहुत प्यार करते हैं और सच तो यह है कि वे प्रकृति-मात्र को ही प्यार करते हैं. जब हमारे परिवार में बंटवारा होने वाला था तो हमारे एक रिश्तेदार ने पाएशाला के इन पेड़ों को कटवाकर मोटी रकम बनाने का सुझाव दिया. उनके विचारों को सुनकर पिताजी उदास हो गये. वे बोले- अपने हाथ-पांव भी भला कोई काटकर बेचता है?&lt;br /&gt;पिताजी हमारी दैनंदिन गतिविधियों में तक आदर्शवादी हैं. वे हमें श्रम की महत्ता लगातार बताते रहते हैं. बराबरी का संस्कार हमें उठते-बैठते सिखाया गया. बड़े-छोटे की व्यर्थता और सह-अस्तित्व की व्यापकता हमें घोलकर पिलायी गयी.&lt;br /&gt;पिताजी सिर्फ हमारे पिता ही नहीं, वे हमारे हीरो भी हैं. हम उन जैसा होना चाहते हैं. उनके बताए कामों पर हम लगन से जुट जाते हैं. हम सभी में यह होड़ है कि काम को पहले कौन पूरा करता है और शाबासी का हकदार बनता है. लेकिन पिता हमारे अबूझ किस्म के हैं. वे शाबासी भी बहुत गम्भीर किस्म की देते हैं. उनकी शाबासी भी आदर्शतम किस्म की होती है. जीवन जीने के श्रेष्ए मापदण्ड वह हमारे व्यवहार में देखना चाहते हैं. उनके विचारों में मानवीय दुर्बलता दिखायी नहीं देती. वे हमें सहज और दृढ़ इंसान बनाना चाहते हैं. &lt;br /&gt;पिताजी हममें काम को बेहतर से बेहतर करने का उत्साह भरते हैं. वे हमें प्राणी-मात्र से, सम्पूर्ण प्रकृति से प्रेम करना सिखाते हैं. चींटी को मारने से भी पाप लगता है, ऐसे विचारों के बीज उन्होंने हमारे कोमल मनों में बहुत धीरज और जतन से बोए हैं. उन्होंने हमें हर काम को सहजता और खेल-खेल में करना सिखाया है। हमें पता ही नहीं चला कि कब खेलते हुए हम पढ़ने लगते और कब पढ़ते हुए हम खेलने लगते. उन्होंने हमें निर्भय रहना सिखाया है, क्योंकि उन्होंने हमें गलत कामों से डरना सिखाया है. उन्होंने हमें हमेशा अपने में गलती खोजने की सीख दी है, क्योंकि उनका मानना है कि मनुष्य की सारी तरक्की का इतिहास गलतियों के पन्नों पर लिखा गया है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हम भी पिता हैं&lt;br /&gt;हम भी पिता बन गए हैं. पर एक सवाल है जो लगातार हमारा पीछा कर रहा है कि क्या हम आदर्श पिता हैं? क्या हमारे अपने बच्चों की नजर में हम हीरो जैसे हैं. क्या हमारे बच्चे भी हमें उस सम्मान की नज़र से देखेंगे, जैसे कि हम अपने पिता को देखते हैं?&lt;br /&gt;प्रश्न है कि हम उन्हें क्या सिखा रहे हैं? उन्हें क्या दे रहे हैं? देने को हमारे पास बहुत कुछ है सिवाय समय के. जिस समय-समाज में हम हैं उसके लिहाज़ से बच्चों की सारी ज़रूरतों को हमने पूरा किया है. अच्छा खाना, अच्छे कपड़े, अच्छा घर, अच्छी सुविधाएँ, लेकिन क्या एक पिता की हैसियत से बच्चों के लिए इतना सब करना ही पर्याप्त है? वह नैतिक साहस और संस्कार जो मैंने अपने पिता में देखा और सहज ही पाया है, अपने बच्चों को वैसे संस्कार क्या मैं दे पा रहा हूँ?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कुनेन जैसे सच&lt;br /&gt;गलत को गलत कहने और स्वीकारने का साहस, अपनी गलतियाँ खोजकर उन्हें सुधारने और दूसरों को बताने का साहस, पैसे की सुचिता यानी ईमानदार तरीकों से कमाये गये धन की महत्ता, भौतिक सुख-सुविधाओं की ओर कभी न समाप्त होने वाली लार-टपकाऊ लिप्सा से वितृष्णा. जिसे आज की दुनिया में बहुत व्यवहारिक होना कहते हैं, उस शातिर दोगलेपन से बचाव.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उपसंहार&lt;br /&gt;ऐसा कहा गया है कि अनुभव पर आशा की विजय होती है.&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3760252429097979220-392898479102233405?l=atmaramsharma.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://atmaramsharma.blogspot.com/feeds/392898479102233405/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3760252429097979220&amp;postID=392898479102233405' title='3 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3760252429097979220/posts/default/392898479102233405'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3760252429097979220/posts/default/392898479102233405'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://atmaramsharma.blogspot.com/2008/07/blog-post_21.html' title='बढ़ती उमर और बचपन की यादें'/><author><name>Atmaram Sharma</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11944064525865661094</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://bp0.blogger.com/_ws8fvUK17cA/SIFlbEXxXJI/AAAAAAAAABo/-M-oWunBkdA/S220/atm+01+copy.gif'/></author><thr:total>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3760252429097979220.post-3254251158941745837</id><published>2008-07-20T22:36:00.000-07:00</published><updated>2008-07-20T22:37:54.269-07:00</updated><title type='text'>दिसंबर १९८४ की एक रात</title><content type='html'>चाँदी जैसे उज्जवल मुख की&lt;br /&gt;सुन्दरी मुझे सहलाती है&lt;br /&gt;घुँघराले काले बाहों से&lt;br /&gt;वह रोज मुझे बहलाती है&lt;br /&gt;आकाश से लम्बी आशाएँ&lt;br /&gt;वह रोज मुझे दे जाती है&lt;br /&gt;तन की - मन की - यौवन-धन की&lt;br /&gt;वह रोज झलक दिखलाती है&lt;br /&gt;बस इच्छा इतनी होती है&lt;br /&gt;थोड़ा-सा उसे छूकर देखूं&lt;br /&gt;अफसोस तो बस इस बात का है&lt;br /&gt;वह रोज स्वप्न में आती है.&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3760252429097979220-3254251158941745837?l=atmaramsharma.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://atmaramsharma.blogspot.com/feeds/3254251158941745837/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3760252429097979220&amp;postID=3254251158941745837' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3760252429097979220/posts/default/3254251158941745837'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3760252429097979220/posts/default/3254251158941745837'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://atmaramsharma.blogspot.com/2008/07/blog-post_20.html' title='दिसंबर १९८४ की एक रात'/><author><name>Atmaram Sharma</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11944064525865661094</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://bp0.blogger.com/_ws8fvUK17cA/SIFlbEXxXJI/AAAAAAAAABo/-M-oWunBkdA/S220/atm+01+copy.gif'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3760252429097979220.post-6667586207251453816</id><published>2008-07-19T08:35:00.000-07:00</published><updated>2008-07-19T08:38:03.427-07:00</updated><title type='text'>घर का जोगी</title><content type='html'>अभी हम लोग 'लरका-बिटियाँ' वाली उमर में ही थे और जोशी कक्का हमें बूढ़े-पुराने लगते। कक्का को रामायण कंठस्थ थी और 'बदोबास' याने राम का वनगमन प्रसंग अत्यधिक प्रिय था। जब वे इसे सस्वर गाते तो ऑंसू उनकी ऑंखों से झरने लगते। हमें यह समझ नहीं आता कि एक तरफ तो कक्का कहते हैं कि हमें राम की तरह आज्ञाकारी होना चाहिए और वही राम जब पिता के आदेश का पालन करते हुए वनगमन करते हैं तो कक्का धार-धार क्यों रोते हैं।&lt;br /&gt;कक्का की आवाज़ पतली है। उनकी चाल भी नाजुक है। मसखरी करने वाले तो यहाँ तक कहते हैं कि कक्का घर में काम करते हुए तौलिया सिर पर डाल लेते हैं, बिलकुल काकी की तरह।&lt;br /&gt;हमारे यहाँ मंदिर था। अब भी है। शाम की पूजा-आरती में कक्का नियमित आते थे। आरती के बाद जै बोलने में कक्का सबसे आगे रहते।&lt;br /&gt;श्री रामचन्द्र कृपालु भज मन... की स्तुति प्रारंभ करते ही कक्का मगन हो जाते। हमें आज तक समझ नहीं आया कि मंदिर में मूरत कुंजबिहारी यानी राधा-कृष्ण की है और स्तुति रामचन्द्रजी की गायी जा रही है।&lt;br /&gt;कक्का का पूरा नाम नारायणदास जोशी था, लेकिन वे जगत कक्का थे। जैसे जिज्जी, फुआ, मौसी, काकी, मामी संबोधन व्यक्तिगत और चारित्रिक गुणों की वजह से मिल जाते हैं- सभी उन्हें कक्का ही कहते।&lt;br /&gt;वे शनीचरी माँगते, मूल पूजते। मूल नक्षत्र में पैदा हुए बच्चों पर से मूल उतारने की पूजा। हमारे मोहल्ले में भी वे आते, लेकिन हमारे घर से वे शनीचरी नहीं लेते। हमारा घर देवस्थान के साथ ही उनका गुरु स्थान भी था, सो उसका दान वे कैसे स्वीकार कर सकते हैं- यह तर्क था उनका।&lt;br /&gt;हमारे पी.टी.आई. मास्साब जो हमें ऍंगरेजी भी पढ़ाते और अशोकवारी बखरी की अटारी में रहते थे, कक्का के संदर्भ में सहज ही कहा करते कि शनीचरी माँगना भी एक तरह से भीख माँगना है। लेकिन शनीचरी माँगना भीख माँगना नहीं है। राम-राम की सुरीली टेर लगाते कक्का ज्यों ही किसी दरवाजे पर रुकते, अगले घर की महिलाएँ भी शनीचरी देने के लिए सामान उठाने लगतीं। शनिवार को दिया जाने वाला दान यानी मीठा तेल, आटा, दाल और खड़े नमक की दो डिगरियाँ। कक्का के कँधे पर कई झोलियाँ होतीं, जिनमें वे सीदे के सामान को अलग-अलग रखते। तेल के लिए पीतल की बाल्टी होती। कक्का अपने मुँह से कभी कुछ नहीं माँगते। वे तो बस राम-राम की टेर लगाते। कई बार वे मोहल्ले के किसी पेड़ के नीचे बैठ जाते और कई घरों से महिलाएँ आकर उन्हें शनीचरी  देती जातीं। इसी के साथ दुनिया जहान की बातें भी चलती रहतीं। तीज-त्यौहार, अवसर-काज, पूने-अमावस, महूरत-ग्रह-दशा संबंधी दसियों सवाल के जवाब कक्का सहजता से देते रहते। कक्का से सभी घरोबा मानते। उनके सामने अपनी निजी समस्याओं को भी रखते। 'कक्का लरका बिगर गओ है - बात नईं सुनत', 'मोड़ी के लाने कुंडली नहीं मिल रई', 'बाहर गाँव जाने है - मुहूरत कैसो है', जैसी समस्याओं के कक्का सहज भाव से जवाब देते। 'रामजी सब ठीक करिहैं', कक्का की रामबाण दवा है जो अचूक भी है और असरकारी भी।&lt;br /&gt;कक्का बड़े आस्थावान हैं। दुनिया जैसी भी है उसमें उनकी बड़ा आस्था है। निहायत शुक्रियानी अदा से वे कहते- 'बड़े भाग मानुष तन पावा।' उनकी दार्शनिकता गहरी है कि नहीं, लेकिन महिलाओं को उस पर गहरा भरोसा होता, हाथ से काम और मुँह से राम वाली पध्दति का प्रचार कक्का की अनोखी शैली है। 'जाही विधि राखे राम - ताही विधि रहिए' उनका जीवन सार है। वे हर हाल में निश्ंचित रह लेते हैं। वे कहते 'कछु लेके तो जाने नइयाँ, इतई धरो रह जाने सब'।&lt;br /&gt;'एक घड़ी, आधी घड़ी, आधी में पुनि आधि, तुलसी संगत साधु की, हरे कोटि अपराध।' साधु की संगत पाने के लिए कक्का की हुलास कभी खत्म नहीं होती। गाँव में कहीं भी कथा-सत्संग हो कक्का स्थाई श्रोता हैं। वे पहले पहुँचते और आखिर में जाते। 'राम रस बरसन लगो गलियन में' बरसते हुए राम रस को कक्का तल्लीनता से समेटते। इधर कानों में रसमयी कथा प्रवेश करती, उधर ऑंखों से धारा बह निकलती। कक्का की भाव विह्वलता जग जाहिर है। शायद इसी वजह से मसखरों की जमात में वे लुगया कहाते हैं। इसका उन्हें भान है या नहीं, पता नहीं।&lt;br /&gt;कक्का क्रोधित हों तो रोते हैं, प्रसन्न हों तो रोते हैं। किसी पुराने से मिलना हो जाए तो रोयें। काहू से बिछड़ना हो गया तो रोते हैं। वे इतना क्यों रोते हैं। उनका रोना भी अज़ीब है। ऑंखों में पानी भर आया और हो गया रोना। उनके लिए रोने का मतलब फुक्का फाड़कर रोना नहीं है।&lt;br /&gt;कोई पूछे 'कक्का कैसे हो' वे कहते- 'सब रामजी की कृपा है'। यह रामजी की कृपा सब जगत पर लगातार बरस रही है। वे कहते- 'देखो घाम मिल रओ, पानू मिल रओ, हवा मिल रई। जेई तो कृपा है रामजी की। ईके लाने कौनऊ पइसा तो खरचने नहीं पड़ रए हैं'। ईश्वर तूने इतनी सारी नियामतें हमें दी हैं। मज़ा यह कि इसके बदले तू हमसे कुछ नहीं चाहता। कक्का की भावना बड़ी प्रबल है, ईश्वर की निष्ठा में कक्का तृप्ति बोध महसूस करते हैं। वे कहते कम और महसूस ज्यादा करते हैं।&lt;br /&gt;आत्मा परम हो गई है जिनकी ऐसे प्राणियों को कक्का परमात्मा कहते. 'ईश्वर अंश जीव अनिवाशी'. इस संसार में दिखने वाली हर वस्तु में उस ईश्वर का अंश विद्यमान है, कक्का इस बात पर हमेशा दृढ़ रहते.&lt;br /&gt;वे विशुध्द रूप से काम से काम रखने वालों में से एक हैं. 'न ऊधौ को लेने, न माधव को दैने' वाली परम्परा वाले. उनकी बातों में गहरा दर्शन जैसा प्रतिबिम्बित होता, जो होता गहरा पर लगता सहज. यही कारण है कि महिलाओं में वे बड़े लोकप्रिय हैं.&lt;br /&gt;'मो सम दीन न दीन हित' वाली छवि उनके चेहरे पर स्थायी तौर पर विराजमान रहती. मनुष्य का करुणावतार उनकी ऑंखों में हरेक के लिए छलकता.&lt;br /&gt;गिने चुने लोगों को छोड़कर शायद ही वे किसी पर नाराज होते होंगे. वे व्यस्त दिनचर्या के आदी थे. 'हाथ में काम, मुँह में राम' के हामी होने के कारण उनका मन लगातार काम में रमा रहता था. वे काम को छोटा या बड़ा कभी नहीं मानते. यही कारण है कि महिलाओं द्वारा किए जाने वाले कामों को भी कक्का सहजता से कर लेते थे. दोर-दरवाजे पर झाडू फेरने में उन्हें कोई लज्जा नहीं, ढिक देकर लीपने में उन्हें आलसी नहीं आती, मीठे कुआ पर महिलाओं की भीड़ में कक्का अपनी ताँबे की गुन्डी लिए सुबह से देखे जा सकते हैं. उन्ना वे फीचें, बासन वे माँजें, रोटी बनाने में उन्हें कोनऊ संकोच नई आउत, स्वपाकी होने के दसियों फायदे कक्का गिना सकते हैं. सच तो यह है कि अपने पाँच बच्चों को कक्का ने ही पाला है.&lt;br /&gt;कक्का और काकी विरले ही एक साथ दिखाई देते. आपस में उनकी कद-काठी विपरीत ध्रुव थी. काकी का स्वभाव ही मर्दाना नहीं था, बल्कि उनका ऊँचा-पूरा कद उन्हें मुकम्मल 'मरदाना' व्यक्तित्व बनाता था. कक्का रोज मंदिर जाते, जबकि काकी एकादशी की कथा सुनने ही मंदिर जाया करतीं. कक्का का जब अपने बड़े भाई से बँटवारे को लेकर झगड़ा हुआ तब इसमें काकी ने कक्का को पीछे धकेल दिया और हाथ में बका लेकर खुद मोर्चा सम्हाला. काकी ने इस झगड़े में मोर्चा क्या सम्हाला, बाकी सब मोर्चों पर भी वे ही आगे रही आयीं. काकी की मुस्कान बड़ी प्रेरक थी. आधे उनकी दबंगता से उनसे दबते और बाकी बचों को वे अपनी मोहकता से कब्जे में कर लेती थीं.&lt;br /&gt;कक्का किसी से भी झगड़ा नहीं करते थे. काकी से भी नहीं. मगर एक दिन उनका काकी से झगड़ा हो गया. चौंतरे पर बैठकर कक्का गालियाँ दे रहे थे. उनकी गम्मखोरी उड़न-छू हो गयी थी. गालियाँ वे अपने लड़कों को दे रहे थे. जिन्हें वे अक्सर धुँधकारी कहते. उनके दोनों बेटे दारू पीकर लड़ पड़े थे. एक अस्पताल में, दूसरा पौर में पड़ा था बेसुध. कक्का को गालियों की हिलोरें उठ रही थीं. कभी बेटों, फिर बहुओं और फिर काकी तक गालियाँ पहुँच रही थीं. काकी पड़ौसन के पापड़ बिलवा रही थीं. उन्हें जैसे कुछ पता नहीं था, जबकि कक्का की पतली आवाज़ पड़ौसन साफ तौर पर सुन रही थी. पड़ौसन ने काकी को छेड़ा- 'काय काकी, कछु हो गओ का', काकी सहज भाव से बोलीं- 'तुमाओ मों'.&lt;br /&gt;कक्का की समझ में लड़कों की दो ही छवियाँ रहतीं- या तो वह धुँधकारी होगा या फिर गोकर्ण. उनके दोनों बेटे धुँधकारी थी. अब बाकी के जितने बचे उन्हें कक्का गोकर्ण बनाने का प्रयास करते रहते. यह प्रयास वे बड़ी उम्मीद से करते. कक्का नियम से अपने बनाये सभी ठिकानों पर जाते और कच्चा उमर के तमाम बच्चों को तथाकथित अच्छी शिक्षा देते. एक दिन इन्हीं कम उमर बच्चों में से किसी ने कक्का की परदनी में करेज लगा दी और कक्का के पुण्य का काम छूट गया.&lt;br /&gt;उमर के तीन 'पन' यानी बचपन, जवानी और बुढ़ापा तो सभी जानते हैं, पर कक्का कहते कि हरेक 'पन' की भी यही तीनों स्टेजें होती हैं. मतलब बचपन का बचपन, बचपन की जवानी और बचपन का बुढ़ापा, जवानी का बचपन, जवानी की जवानी और जवानी का बुढ़ापा. इसी तरह बुढ़ापे का बचपन, बुढ़ापे की जवानी और बुढ़ापे का बुढ़ापा.&lt;br /&gt;जब हम बचपने की जवानी में थे, तब कक्का बुढ़ापे की जवानी में थे.&lt;br /&gt;कक्का जिस जमाने में पले-बढ़े उस दौर में श्रध्दा-भक्ति का बड़ा जोर था. हरेक को किसी न किसी पर भरोसा था और कोई न मिले तो भगवान पर हरेक का भरोसा था.  सीमित आय, सीमित खर्च का स्वाबलम्बी समाज था, जहाँ 'जाही विधि राखे राम ताही विधि रहिए' में सभी आस्था रखते थे. जीवन दौड़ का नहीं बल्कि जीने की कला का नाम था. अच्छे-बुरे में ज्यादा फर्क नहीं था. क्योंकि बुराई को कम लोग पसंद करते थे. या लोग बुरे लोगों को नहीं बुराई को नापसंद करते थे. कक्का कलारी कभी नहीं गए. पर कलारी की खबरें कक्का के पास हर दूसरे दिन उन तक पहुँचती थीं. कक्का के दोनों बेटे दारूखोर थे और दारू पीकर झगड़ा करने में कभी गुरेज नहीं करते थे. वे रोज कमाते, रोज दारू पी जाते. उनके बाल-बच्चों का खर्चा कक्का के सिर पड़ता था. कक्का अपने बेटों से जितनी चाहे नफरत करें, पर अपने नाती-पोतों से बहुत प्यार करते थे. कक्का अपनी खून-पसीने की कमाई का एक बड़ा हिस्सा उन पर खर्च कर देते थे. कक्का टायर की चप्पलें पहनते, पर कक्का के नाती पंप-शू डाटकर चलते. कक्का जीवनभर लट्ठा की कुरती और लंकलाट की धोती पहनते रहे, पर उनके नाती-पोतों ने टेरीकाट की शर्ट और पॉपलीन का पजामा पहना. कक्का और काकी में इस बात पर भी झगड़ा होता और काकी झगड़कर अपनी लड़कियों के यहाँ रहने चली जातीं. उनकी एक लड़की सरकारी नौकर हो गयी थीं और काकी हमेशा के लिए उसके साथ रहने को चली गयीं. बाद में उसकी शादी हो गयी, तब भी काकी वहीं बनीं आयीं.&lt;br /&gt;ठंड हो, बरसात हो, कक्का के नियम में मौसम कभी बाधा नीं बन पाया. 'चुटइय्या में गाँठ बाँध लो' वाली परम्परा कक्का को विरासत में मिली. बचपन में कर्म-काण्ड लायक श्लोक सीखते समय उन्हें जो संस्कार मिले उनमें समय की पाबंदी और प्रतिदिन का अभ्यास शामिल था. काम की महत्ता को कक्का गहरे तक समझते थे, वे कहते- 'मियाँ क्या कर, पयजामा फाड़कर सियाँ कर'. ठलुआ बैठने से हाथ-पाँव में जंग लगती है अत: कुछ न कुछ काम करते रहना जरूरी है फिर चाहे पायजामे को फाड़कर दोबारा क्यों न सिलना पड़े।&lt;br /&gt;समाज में कक्का की छवि 'गऊ' आदमी की थी। उनसे उनके हमउम्र जिस बेफिक्री से बात कर लेते थे, बच्चे और महिलाएँ भी उसी अधिकार से बातें कर लेते थे. हरेक उन्हें अपने सुख-दुख में शरीक करता था. दूसरों से छुपाने योग्य बातें भी कक्का को बतायी जाती थीं. मजा यह कि वे बड़ी गंभीरता से बातों को सुनते और सनातन समाधान प्रस्तुत करते. बातों को इधर-उधर न करने की कक्का की ख्याति थी. उन्हें अपनी छवि का बड़ा ख्याल रहता. उनका सारा आचार-व्यवहार इसी छवि की लक्ष्मण रेखा के गिर्द घूमता रहता. सज्जनता के उदाहरण कक्का पर जाकर रुकते. कक्का ने अपने गुरू पंडित शोभारामदास शास्त्री की संस्कृत पाठशाला में चपरासी के तौर पर जीवन की शुरूआत की. उस जमाने में नौकरी को बुरा माना जाता. 'सबते अधम चाकरी'. हाँलाकि नौकरी मिलती भी नहीं थी. चूँकि पंडितजी पाठशाला चलाने का नेक काम कर रहे थे सो कक्का ने उनकी पाठशाला में यह काम करना शुरू कर दिया. यह बात आजादी से पहले की थी और कक्का को तनख्वाह मिलती थी बारह रुपए महीना. सस्ते का जमाना था सो बारह रुपए भी बड़ी कीमत रखते थे. कक्का का काम था शिक्षा समिति के सदस्यों से स्कूल की गतिविधियों से संबंधित कागजातों पर दस्तखत करवाना. इसके अलावा कक्का इस पाठशाला में 'पीर, बाबर्ची, मिश्ती, खर' थे. उन सारे कामों को जिन्हें दूसरे छोड़ देते, कक्का सहजता से स्वीकार कर लेते। चंदे की रसीदें बाँटना, विद्यार्थियों की रहने की व्यवस्था करना, शास्त्री जी की सेवा-टहल करना कक्का के अघोषित काम थे.&lt;br /&gt;सहजता कक्का के स्वभाव का मूल आधार है. 'हानि लाभ जीवन मरण यश अपयश विधि हाथ' में उनकी गहरी आस्था है. रोजमर्रा की सामान्य गतिविधियाँ उन्हें उद्वेलित नहीं करतीं. बच्चे रो रहे हैं, महिलाएँ झगड़ रही हैं, बाप को बेटे ने पीट दिया है, किसी के घर बेटी की बारात आ रही है, किसी को हवेली बन रही है, कोई नयी दुकान खुल रही है, सरपंची का चुनाव प्रचार हो रहा है, राय बहादुर की मौड़ी कलुआ के संग भाग गई है, 'प्रेमीद्वारे' में छापा पड़ गया है, 'चौकी' में अनाचार हो गया, इंटरमीडिएट की परीक्षा के पेपर बाजार में बिक रहे हैं, झंडा छाप बीड़ी वाले प्रचार में एक बिन्डल पर एक बिन्डल मुफ्त में बाँट रहे हैं. 'तिलयाँत' में जुआ पकड़ गया है, रमुआ का कुऑं 'भैं' गया है, मनगोले को लरका जेबकटी में 'बिद' गओ, रासबिहारी खौं ठकुरास ने दचक दओ, जैसी खबरों से कक्का निर्विकार बने रहते हैं, वे पानी में तेल जैसे हैं. दुनिया जहान की घटनाओं का, धतकरमों का कक्का की दिनचर्या पर कोई फर्क नहीं पड़ता. वे औंचक होकर कहीं नहीं रुकते. अपनी सहज गति और तन्मयता से वे अपने में मगन बने रहते हैं. 'काहु न कोऊ सुख-दुख कर दाता' कहकर वे हरेक छोटी-बड़ी घटना को खारिज कर देते हैं. वे कोई घटना नहीं बनना चाहते और समरस बने रहते हैं.&lt;br /&gt;स्वाबलंबन में उनकी गहरी आस्था है. वे अपनी जरूरत के हर छोटे-बड़े काम स्वयं ही कर लेते हैं. सहज जिज्ञासुवृत्ति होने के कारण उन्होंने बहुत सारी बातें सीख ली हैं. टोने-टोटकों का मनोविज्ञान वे समझते हैं इसलिए उनका समाधान भी वे चतुराई से हँसते हुए कर लेते हैं. 'वद सूंटना' उन्हें आता है, बिच्छू के काटे का इलाज उनके पास है, फोड़ा-फुन्सी को पकाने की दवा वे जानते हैं, हवा-बैर का उतार उनके पास है, तीज-त्यौहार, ग्रह-शा, दिशा-शूल, दिनमान, शुभ-असुभ उन्हें कण्ठस्थ हैं, ढेरों बातों के वे रामबाण हैं, ऍंधों की लाठी हैं और कइयों के लिए वे 'लत्ता के साँप' भी बन जाते हैं.&lt;br /&gt;कक्का की एक और छवि है. वे पक्के रामभक्त हैं. गाँव में कहीं भी कथा-कीर्तन हो, कक्का सबसे पहले वहाँ पहुँचेंगे और आखिर में 'फट्टा उठाकर' ही लौटेंगे. कथा-प्रवचन के समय उनकी जिम्मेदारी और सामाजिकता देखने लायक होती है. आरती फेरने से लगाकर प्रसाद वितरण का काम उनको सहज ही सौंपा जाता है. कक्का अपने को सेवक मानते. वे कहते 'सबते सेवक धर्म कठोर' और इस कठोर धर्म का पालन भी वे हँसते-हँसते करते. उनकी बोली में अपनेपन की मिठास घुली होती. कार्तिक में जब कतकारीं 'भई न बिरज की मोर, सखी री मैं' गातीं तो कक्का के कण्ठ से स्वर अपने आप फूट पड़ते. हाँलाकि कक्का बेसुरे नहीं थे, पर भाव-विभोर होने से उनका गला और ऑंखें भर आती थीं और उनका स्वर भर्रा जाता था.&lt;br /&gt;कक्का को पैतृक सम्पत्ति के तौर पर तीन मकान और कुछ बीघा जमीन मिली थी. यह जमीन उन्हें अपने भाई से लम्बी लड़ाई के बाद हासिल हुई थी. तीनों मकान कच्चे-पक्के थे यानी आधे कच्चे और आधे पकी ईंटों से बने. गाँवों के परम्परागत मकानों जैसे. गोबर से लिपे और पोतनी से पुते. जिसमें कक्का रहते उसमें पहले पौर थी, उसके आगे ऑंगन था. ऑंगन से लगी हुई छपरी थी. ऑंगन के एक किनारे पर घिनौची थी, जहाँ एक अमरूद, एक नींबू, एक अनार और एक नागदौन का झाड़ लगा था. घिनौची के बगल से अटारी के लिए सीढ़ियाँ थीं. अटारी पर कक्का के बहू-बेटे का कब्जा था. कक्का हमेशा से पौर में ही सोते थे. उनकी खाट हमेशा पौर में टिकी रहती. दीवार में ठुके घुल्लों पर उनकी बंडी और परधनी टंगी रहती. दीवार के आरों में ढिबरी रखी रहती. दस फीट गुणा सात फीट का हिस्सा 'जोई राम-सोई राम' के अंदाज में रहा आता, बिल्कुल कक्का के अंदाज में, बिना किसी बदलाव के.&lt;br /&gt;तीन मकानों में से एक में उनकी बेटी रहती और एक मकान हमेशा किराये पर लगा रहता. कक्का के कमान में रहने के लिए जब लोग आते तो वे किरायेदार होते और जब मकान खाली करते तो घरवालों में बदल जाते. कक्का सबको घराती बना लेते. उनके किरायेदार ट्रांसफर होने पर ही मकान खाली करते. कक्का का संग-साथ एक बार होने पर उन्हें भुलाया नहीं जा सकता. कक्का बहुत कम गाँव बाहर जाते, लेकिन वे जब भी आसपास के किसी गाँव, शहर जाते तो इन्हीं अपने पुराने किरायेदारों के यहाँ रुका करते. कक्का के पहुँचने से सभी परिजनों में खुशी की लहर दौड़ जाती. कक्का का आत्मीय संग हरेक पाना चाहता. कक्का की तासीर ही कुछ ऐसी थी कि वह हरेक में घुल-मिल जाती. लोग अपने भीतर चलने वाली उथल-पुथल को कक्का के सामने उजागर कर देते. और कक्का धीरज से उनकी बातें सुनते और खरे समाधान प्रस्तुत करते, नहीं तो सांत्वना प्रदान करते. कक्का किसी के मेहमान बने तो चार-छह दिन से पहले उनका छुटकारा नहीं, लोग उन्हें मनुहार कर करके रोकते. कक्का के लिए अच्छे लोगों की कभी कमी नहीं रही.&lt;br /&gt;कक्का ने कभी किसी से अनुचित व्यवहार नहीं किया. वे उस परम्परा के थे जहाँ अपने बच्चों का परिचय भी 'आपके बच्चे हैं' के तौर पर दिया जाता है. इस तरह से कक्का का अपना कुछ नहीं था, जो था सब दूसरों का था. इसलिए उनका आचरण हमेशा दूसरों के लिए अनुकरणीय रहा आया. 'सादा जीवन उच्च विचार', 'कम खाना गम खाना' कक्का के जीवन का मूल स्वभाव है. उनका चरित्र रक्षात्मक है.&lt;br /&gt;गाँव का किसान चैत में, फसल आने पर अपनी सब देनदारियाँ चुकाया करता है. बढ़ाई, कुम्हार, नाई, धोबी, लुहार, साहूकार और अंत में बामन की भी देनगी चुकता करना होती है. कक्का के भी सैकड़ों किसान जजमान थे जो सालभर में एक बार हिसाब-किताब चुकता करते थे. चैत के दिनों में कक्का की व्यस्तता बढ़ जाती. सभी किसानों के खलिहानों में कक्का 'थन्ना छूने' जाते. वे खड़े-खड़े हालचाल पूछते, ज्ञान की बातें करते और किसान की दी हुई अन्न राशि को हाथ से छू देते और उगले खलिहान की ओर रवाना हो जाते. कक्का द्वारा स्वीकार किया गया अन्न, उनके घर तक पहुँचाने की जिम्मेदारी किसान की होती. कक्का एक दिन में दस-बारह किसान तक निपटा लेते और चार-छह दिनों में बीमार हो जाते. बाकी बचे किसानों के लिए वे कहते 'जोई राम सोई राम'. अधिकांश किसान कक्का का हिस्सा उनके घर बगैर उनके छुए खलिहान तक पहुँचा जाते.&lt;br /&gt;'ईश्वर अंश जीवन अविनाशी, सत चेतन घन आनंद राशी' कक्का भाव विभोर होते और चौपाइयाँ गाने लगते. वे सचमुच हरेक में ईश्वर को देखते. 'चींटी मारने से पाप लगता है, क्योंकि उसमें भी वही आत्मा है जो हमारे भीतर है' जैसी सीखें उन्हें सैकड़ों बच्चों को सिखाई होंगी. दूसरों को तकलीफ पहुँचाने को भी वे पसंद नहीं करते. 'परहित सरस धरम नहिं भाई, पर पीड़ा सम नहिं अधमाई'. हर बात, हर घटना, प्रत्येक आचरण के संबंध में उनके पास चौपाइयाँ थीं. मुश्किल से मुश्किल समस्याओं के समाधान वे रामचरित मानस में से खोज देते. मानस की प्रश्नोत्तरी उन्हें सधी हुई थी. 'कक्का अड़चन आन पड़ी, कैसे सुलझेगी?' कक्का जिज्ञासु की उँगली रामायण के प्रश्न-श्लाका चक्र में रखवाते. वे यह भी बता देते कि उँगली रखते समय जिज्ञासा मन में चलना चाहिए और ऑंखें बंद होना चाहिए. कक्का ने हजारों लोगों की जिज्ञासाएँ शांत की हैं. कक्का कहते हैं- 'पूजा तीन प्रकार की छोटी, बड़ी, मझोल' जैसा यजमान होता, उसके लिए वैसा समाधान वे हाजिर कर देते.&lt;br /&gt;कक्का को जीवन की सहज लय प्राप्त हो गई थी. वे उसी में रमे रहते थे. अवसर-काज, शादी-विवाह, मेले-ठेले, जनम-मरण के कैसे भी आयोजनों में वे बहुत कम जाते. बढ़ाई-बुराई की वृत्तियों से वे ऊपर उठ गए थछे. वे कहते- 'बहुत दुनिया देखी है हमने, सार यही है कि माटी को जौ तन, माटी में मिल जानें, कछू साथ नईं जानें'. वे गाँधीवाद नहीं जानते, लेकिन गाँधी गुमनाम अनुआयी थे, बुरी बातों को बोलने, सुनने और देखने से परहेज करते. भारत छोड़ो आंदोलन के समय 'गाँधी बब्बा' की सभा के धुँधले चित्र कक्का को याद थे. तब गाँव-देहात से लोगों के हुजूम के हुजूम गाँधी बब्बा को एक नजर देखने के लिए उमड़ पड़े थे. तब तक गाँधीजी रहस्यमय व्यक्तित्व के तौर पर सारे इलाके में प्रचारित हो गए थे.&lt;br /&gt;कक्का का भरोसा कर्म में था- 'कर्म प्रधान विश्व करि राखा, जो जस करे सो तस फल चाखा'. कर्म की तरफदारी और आलस्य के खिलाफ उन्हें दसियों श्लोक, पचासों कैनातें याद थीं. कक्का गुड़ पहले छोड़ते फिर गुलगुलों से परहेज करने की सीख देते. 'तीन खायें, तेरह की भूख' से भी वे मुक्त हो चुके थे. 'गोधन, गज धन, बाज धन और धन रतन की खान, जब आवे संतोष धन, सब धन धूरि समान'. वे संतोषी जीव थे. हाय-हाय को वे 'मनस:-वाचा-कर्मणा' अपव्यय मानते.&lt;br /&gt;कक्का हफ्ते में एक दिन मौन व्रत रखते और नमक नहीं खाते. पारणा करते और आखिर में रामधुन गाते. इस दिन वे चीटियों के लिए आटा बिखेरते, मछलियों के लिए आटे की गोलियाँ बनाकर तालाब जाते और घाट पर शांति से बैठकर उन्हें गोलियाँ चुनाते. कक्का के कार्य-व्यापार में पितृ-ऋण, मातृ-ऋण, माटी-ऋण से ऊऋण होने की भावना संचालित रहती. खाने-सोने और रोने को वे जीवन का उद्देश्य नहीं मानते. 'जो जनम अकारथ गवाने को थोड़ी है'. कक्का कबीरपंथी भजन भी गुनगुनाते. 'जस की तस धर दीन्हीं चदरिया' गाते हुए वे मगन हो जाते. उनका सर्वाधिक प्रिय भजन था- 'श्रीरामचंद्र कृपालु भज मन हरण भव भय दारुणं'.&lt;br /&gt;'कम खाना, गम खाना, आये का सत्कार करना' के संस्कार कक्का ने अपने बुजुर्गों से पाये थे. कक्का अपने भाई-बहनों में सबसे छोटे थे सो माँ का दुलार उन्हें बड़ी उमर तक मिलता रहा. उनकी माँ बड़ी गबनारी थीं. भोर चार बजे से उनकी चकिया शुरू हो जाती. वे पीसतीं और गाती जातीं. कक्का एक टाँक पर सिर रखे सोते. मन हुआ तो माँ का दूध भी पीते जाते. कक्का ने पाँच साल तक माँ का दूध पिया. माँ के अत्यधिक संरक्षण ने उन्हें नाजुक बना दिया. कक्का का नाजुकपना पूरे जीवन चला. कक्का का 'मैं' पता नहीं कब समाप्त हो गया था. अब वे 'हम' में बदल गए थे. सम भाव और सामूहिक चेतना कक्का की हमेशा जगी रहती. 'वसुदेव कुटुम्बकम' की छवि उनकी आस्था में इस कदर व्याप्त थी कि अपने पराये का भेद वहाँ नहीं था. जिसे हम कंजूसी हैं उसे वे बचत मानते. जिसे हम लालच कहते, उसे वे मोह मानते- 'मोह सकल व्याधिन कर मूला, तेहि ते पुनि उपजहिं बहु शूला'.&lt;br /&gt;'न हन्यते हन्यमाने शरीरे'.&lt;br /&gt;एक दिन कक्का के बेटों में झगड़ा हुआ और वे हमेशा के लिए अपना पैतृक घर छोड़कर अपनी बेटी के मकान में रहने चले गए. उनकी बेटी सरकारी नौकर हो गयी थी. कक्का के यजमानों को उनके दामाद ने स्वीकार कर लिया था. कक्का द्वारा अपने बेटों के लिए घर छोड़ देने पर पुरा-पड़ौस में उनकी भारी खुसफुस हुई. उन्हें वापस घर लाने के लिए मान-मनौव्वल हुई, लेकिन कक्का अंतिम साँस तक वापस नहीं लौटे.&lt;br /&gt;कक्का के यजमान कई गाँवों में फैले हुए थे.&lt;br /&gt;बच्चों की अधिक शैतानी कक्का को सख्त नापसंद थी. पूजा-आरती खत्म होने के बाद परिक्रमा करने में कक्का सबसे आगे रहते. एक बार किसी ने परकम्मा में कपड़ों का ढेर रख दिया. कक्का को लगा कोई लेटा है. वे घबरा गए और थोड़ी देर में जब सहज हुए तो उन्हें बच्चों की शरारत समझ आई फिर तो उन्होंने सभी को कसकर डांट पिलाई. बाद में बच्चे इस घटना को लेकर कक्का को चिढ़ाने लगे- 'कक्का कोऊ परो है'.&lt;br /&gt;मंदिर के बरामदे में छाया के लिए टीन की चद्दरें लगी हुई थीं, मंदिर पुराना था और ऊपर से खस्ताहाल हो रहा था, जिससे चूने की रेत जैसे कण प्लास्टर गाहे-बगाहे झड़ता और चद्दरों पर गिरता जिससे कई बार लगता कि पानी की बूँदें गिर रही हैं, कई बार लगता कि कोई दबे पैर चल रहा है.&lt;br /&gt;रामकथा चल रही हो तो कक्का कहते हनुमान जी कथा सुनने आ रहे हैं, कृष्णलीला होती तो वे कहते बालकृष्ण लकड़ी की गाड़ी चला रहे हैं- 'गड़-गड़ गड्डी'. गाँव में डेढ़ दर्जन मंदिर थी और जहाँ भी कथा प्रवचन होते कक्का वहाँ एक के बाद एक पहुँचते. एक जगह की आरती करवाते, फिर दूसरी जगह कथा प्रारंभ करवाने पहुँच जाते.&lt;br /&gt;कक्का की सुमरनी हमेशा उनके हाथ में बनी रहती. 'राम नाम' के प्रताप को उन्होंने आत्मसात कर लिया था. वे कहते- 'राम ते अधिक राम कर नामा'. रामभक्तों की हमारे समाज में बड़ी पूछपरख है. 'राम काज कीन्हें बिना मोहि कहाँ विश्राम' की तर्ज पर वे लगातार काम करते रहते. काम को वे कभी छोटा या बड़ा नहीं मानते.&lt;br /&gt;हमारे समाज में बुजुर्गों की एक बनी-बनायी छवि स्थापित हो जाती है और अधिकांश बुजुर्ग इस छवि को ना-नुकुर के बाद देर-अबेर अपना लेते हैं. कक्का ने बुजुर्गों की इस स्थापित छवि के विपरीत अपनी अलहदा तस्वीर गढ़ी थी और बुजुर्ग भी सम्मानपूर्वक आखिर समय तक समाज में रह सकते हैं, इसे मिसाल के तौर पर स्थापित किया था. कक्का बहुत कम बीमार पड़ते. उनका रहन-सहन, खान-पान बहुत संतुलित था. 'बातें कम और काम ज्यादा'. काम से उनका आशय पैसा कमाने के लिए किया जाने वाला काम नहीं है. काम उनके लिए 'कर्म' है यानी कर्म वह जो आशक्ति पैदा न करे, परिणाम की चिंता को ध्यान में रखकर न किया जाने वाला कर्म. उनका पुनर्जन्म में पक्का भरोसा था, वे मानते थे कि आज किया जाने वाला अच्छे कर्म का परिणाम अगले जन्म में प्राप्त होगा.&lt;br /&gt;कक्का का नैतिकता बोध हमेशा जागृत रहा आता. इस मामले में उनकी दृढ़ता जगजाहिर थी. एक बार मूल दीवाली पर उनका एक लड़का जुआ खेलते पकड़ा गया. जुआ पकड़ने वाला थानेदार कक्का की सादगी का कायल था सो उसने नरमी में कक्का के पास सिपाही भेजा और कहलवाया कि कक्का अगर जमानतनामे पर थाने आकर दस्तखत कर दें तो उनके बेटे को छोड़ दिया जाएगा. कक्का ने सिपाही से कहा- 'काय भईय्या, हमारे दस्तखत करबे सें तुम सबको छोड़ दोगे? अगर हाँ तो ठीक है हम चलते हैं और अगर नहीं तो जो हाल सबका होगा वही हमारे लड़के का होगा. हमारो लड़का हमसें पूछ कैं तो जुआ खेल नई रओ तो. अब पकड़ो गओ तो सजा भुगते'. नैतिकता के इस प्रदर्शन के चलते कक्का-काकी में लम्बा झगड़ा चला. महीनों अबोला रहा आया, लेकिन कक्का हमेशा कहते रहे कि उन्होंने जो किया सही किया, जबकि काकी का कहना था कि अपने बच्चों की सुरक्षा के लिए लोग-बाग क्या-क्या नहीं करते. कक्का का कहना था कि हाँ करते हैं- शेर अपने बच्चों को शिकार करना सिखाता है, नेवले का बच्चा साँप को मारना अपने माँ-बाप से सीखता है, लेकिन आदमी इसलिए आदमी है क्योंकि वह 'आहार-निद्रा-भय और मैथुन' के अलावा भी बहुत कुछ अपने बच्चों को सिखाता है. वह सिखाता इसलिए है क्योंकि उसे भी किसी ने सिखाया है. अच्छी शिक्षा, अच्छे विचार हमारे बुजुर्गों ने हमें सिखाये हैं. इसलिए अपने बच्चों को उन्हें बताना हमारा दायित्व है. बच्चे मानें या न मानें यह उनके ऊपर है. मानें तो ठीक, न मानें तो भुगतें.&lt;br /&gt;अजरा अमरवत् प्राज्ञो, विद्याम्-अर्थम् च चिन्तयेत, गृहीत इव केशेशू, मृत्युनाम भय आचरेत्. हितोपदेश का यह श्लोक कक्का को बहुत प्रिय था. वे मृत्यु से भयभीत नहीं थे. भयभीत नहीं थे याने वे सहज भाव से मृत्यु की बात करते थे, अक्सर जिससे हम डरते हैं उसकी चर्चा नहीं करते. वे मृत्यु की चर्चा करते हैं इसलिए उनकी जीवनचर्या जीवन और ऊर्जा से भरी हुई रहती. उन्हें कहीं नहीं जाना है, लेकिन उनकी चाल में तेजी है. उन्हें कुछ नहीं पाना है, लेकिन उनकी करने की गति उत्साह से भरी हुई है. कक्का की दिनचर्या सुबह चार बजे से शुरू होती और रात नौ बजे वे सोने चले जाते.&lt;br /&gt;कक्का के पहनावे से पता चल जाता कि मौसम बदल गया है. गर्मियों में वे बंडी पहनते. बरसात में कक्का की काली बरसाती पहले से निकल जाती. वे उसे धो-पोंछकर सुखा लेते. जाड़ों में कक्का की सदरी हफ्तों पहले धुल जाती. सूख जाती और काँसे के कटोरे को गरम करके उस पर इस्तरी कर ली जाती. कक्का की सदरी बरसों चलती. एक सदरी कक्का ने अबार के मेला से खरीदी थी. काले रंग के ऊन से बनी इसमें सफेद रंग की धारियों की डिजाइन बनी हुई थी. कक्का का मानना था कि तन को ढँकने के लिए कपड़ा चाहिए. कपड़ों से शरीर की शान नहीं है, बल्कि शरीर से कपड़ों की शान बनती है. 'सोहे न बसन बिना नारी'.&lt;br /&gt;कक्का के बुजुर्ग राजदीवानी के अघोषित चाकर थे. खरगापुर दीवानी में बावन गाँव थे. और दीवान को सात तोपों की सलामी मान्य थी. दीवान किशोर सिंह बड़े प्रतापी हुए. उनकी ख्याति साम-दाम-दण्ड-भेद के जानकार के तौर पर थी. कक्का के पड़दादा को किशोर सिंह आनगाँव से लेकर आए थे. उन्हें फलित विद्या सिध्द थी. ज्योतिष के विद्वान और झाड़-फूँक के ओझा के तौर पर उन्हें पूरी अबेर में जाना जाता था. वे खरगापुर अपनी शर्तों पर आए, जिनमें से कुछ यों थीं- वे दरबार के घोषित चाकर नहीं रहेंगे. यानी दरबार से वे पगार नहीं लेंगे. वे किले में पगड़ी और जूते पहनकर जा सकेंगे. उन्हें खेती की जमीन और मकान को जमीन दरबार दान करे. उन दिनों दान की जमीन पर कोई कर देय नहीं होता था. उनकी आखिरी शर्त थी कि पूरा गाँव उनका जजमान होगा और स्थानीय पंडित उनके काम में अडंगा नहीं लगायेंगे. किशोर सिंह ने उनकी सभी माँगें स्वीकार कीं और इस तरह वे खरगापुर आ बसे. खेती की जमीन भी उन्हें गाँव के पास और नाले के किनारे मिली. काली मिट्टी की इस जमीन में लकड़ी के रहट वाला एक कुऑं भी था. दस एकड़ के रकबे की इस जमीन को उन्होंने अपने खून-पसीने से सींचा. इस जमीन की मेढ़ों पर अशोक, चंदन, नीलगिरि, शाल, शीशम, वेल, आम, महुआ जैसे कीमती और फलदार वृक्ष लगाये. वहीं शहतूत, अंग्रेजी इमली, ऊमर, नीम, खैर आदि के पेड़ वहाँ पहले से ही मौजूद थे. नाले के दोनों ओर कबा के पेड़ थे. जिस नदी-नालों के किनारों पर कबा के पेड़ हों उसको सनातन माना जाता है. जमीन की बगल से नाला होने के कारण कुऑं भी हमेशा भरा रहता.&lt;br /&gt;कक्का के पाँव बहुत कम डगमगाए. उनकी सुमरिनी हमेशा चलती रही और उन्हें हमेशा ही दूसरों का ख्याल बना रहा. 'एक बार त्रेता युग माहीं' की तर्ज पर उनकी कथाएँ चलती रहतीं. उनकी ऑंखों की नमी और दिल की उमंग कभी समाप्त नहीं होती. सच्ची बात और सुरीली बानी उनके कंठ में हमेशा मौजूद रही आई. कक्का की छाप-तिलक पक्की है यानी वे रामानंदी तिलक लगाते हैं, गले में कंठी और पैरों में खड़ाऊँ पहनते हैं. वे वीतरागी नहीं हैं, पर वे गृहस्थ सन्यासी हैं.&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3760252429097979220-6667586207251453816?l=atmaramsharma.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://atmaramsharma.blogspot.com/feeds/6667586207251453816/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3760252429097979220&amp;postID=6667586207251453816' title='3 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3760252429097979220/posts/default/6667586207251453816'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3760252429097979220/posts/default/6667586207251453816'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://atmaramsharma.blogspot.com/2008/07/blog-post_19.html' title='घर का जोगी'/><author><name>Atmaram Sharma</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11944064525865661094</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://bp0.blogger.com/_ws8fvUK17cA/SIFlbEXxXJI/AAAAAAAAABo/-M-oWunBkdA/S220/atm+01+copy.gif'/></author><thr:total>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3760252429097979220.post-6388433917310944467</id><published>2008-07-18T00:33:00.001-07:00</published><updated>2008-07-18T00:33:48.390-07:00</updated><title type='text'>दिसंबर १९८४ का कोई एक दिन</title><content type='html'>आत्मा अकेला आँसू बहाता उठता है&lt;br /&gt;अपना कोई अपनापन जता के आओ&lt;br /&gt;बहलाओ बाँहों से बहुत सारा बहुत बार&lt;br /&gt;बेचारा बैचेन बेहाल होता बहुलता से&lt;br /&gt;बेहद वीरानी में बौराया हुआ लगता&lt;br /&gt;मजबूरी में फँसा हुआ बेचारा अकेला है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3760252429097979220-6388433917310944467?l=atmaramsharma.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://atmaramsharma.blogspot.com/feeds/6388433917310944467/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3760252429097979220&amp;postID=6388433917310944467' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3760252429097979220/posts/default/6388433917310944467'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3760252429097979220/posts/default/6388433917310944467'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://atmaramsharma.blogspot.com/2008/07/blog-post.html' title='दिसंबर १९८४ का कोई एक दिन'/><author><name>Atmaram Sharma</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11944064525865661094</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://bp0.blogger.com/_ws8fvUK17cA/SIFlbEXxXJI/AAAAAAAAABo/-M-oWunBkdA/S220/atm+01+copy.gif'/></author><thr:total>1</thr:total></entry></feed>
